Wednesday, 13 November 2019
khabarexpress:Local to Global NEWS
  2016 view   Add Comment

गुरु जम्भेश्वर के नियम व संदेश शाश्वत व सत्य

गुरु जम्भेश्वर के मुकाम समाधि स्थल पर फागिणया मेला

बीकानेर,बिश्नोई समाज के संस्थापक  और 29 नियमों के माध्यम से चराचर जीव रक्षा का संदेश देने वाले गुरु जम्भेश्वर के मुकाम समाधि स्थल पर  शनिवार (1 मार्च 2014) को लगने वाले फागिणया मेले में हजारो श्रद्धालु मत्था टेककर आस्था प्रकट करेंगे।  शुक्रवार को ही प्रदेश के ही नहीं देश के विभिन्न इलाकों से विशेषकर पंजाब, हरियाणा,उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व दिल्ली आदि स्थानों के हजारों की संख्या में श्रद्धालु मुकाम पहुंच गए है। हरियाणा के हिसार से विशेष रेलगाड़ी और अनेक स्थानों से  श्रद्धालु पैदल मुकाम पहुंचकर समाधि स्थल पर शीश नवा रहे है तथा हवन में आहुतियां तथा पक्षियों के लिए चुग्गा दे रहे है। 

मुकाम के साथ श्रद्धालु  समराथल धोरे पर जाकर गुरु जम्भेश्वर का स्मरण कर रहे है। इसी स्थान पर गुरु जम्भेश्वर ने अपने अनुयायियों को पाहल ग्रहण कराकर बिश्नोई समाज के पालनार्थ 29 नियमों की प्रतिष्ठा की थी। पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत व बिश्नोई समाज के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर महाराज ने सन् 1451 में भादो बदी अष्टमी (जन्माष्टमी) के दिन जोधपुर रियासत के पीपासर गांव में एक राजपूत परिवार में जन्म लिया। जांभोजी ने 7 वर्ष तक गाएं चराई तथा लोगों की दुर्दशा एवं चारित्रिक पतन से खिन्न होकर चारों दिशाओं का भ्रमण कर भटके हुए लोगों को सही रास्ता दिखा। सन 1485 में उन्होंने 29 नियमों पर आधारित एक समाज की स्थापना की, जिसे आज बिश्नोई समाज के रूप में पहचाना जाता है।  उन्होंने जो 29 नियम बताये, उनमें शुद्ध जीवन, शुद्ध आहार, भगवान विष्णु का स्मरण, जीवों पर दया, हरा वृक्ष नहीं काटना, सत्य भाषण, निष्ठापूर्वक हवन, अमावस्या पर व्रत, नशे व मांसाहार का त्याग, क्षमा और दया धारण करना आदि प्रमुख थे। ये नियम आज भी इतने शाश्वत एवं सत्य है कि मनुष्य को संतुष्टि पूर्वक जीवन यापन के लिए इन पर चलने की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। 
गुरु जम्भेश्वर महाराज ने 51 वर्षों तक अनेक स्थानों पर भ्रमण कर उपदेश दिए। उन्होंने सन 1536 में मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष नवमी को लोकिक देह को त्याग दिया। बीकानेर से लगभग 74 किलोमीटर दूर जिस स्थान पर गुरु जम्भेश्वर की लोकिक देह को समाधि  दी गई, वहीं आज संगमरमर का विशाल मंदिर बना हुआ है। यही मंदिर बिश्नोइयों  के मुक्तिधाम मुकाम के रूप में प्रतिष्ठत है। गुरु जम्भेश्वर महाराज ने पांच शताब्दी पूर्व ही ’’जीव दया पालणी, रूंख लीलो नहिधावै’’ (जीवों पर दया करनी एवं हरे वृक्षों को नहीं काटने) का संदेश देकर पर्यावरण की परिशुद्धि, वन सम्पदा के संरक्षण का संदेश दिया। गुरु जम्भेश्वर महाराज पर्यावरण संतुलन के महत्व के पूर्ण रूपेण ज्ञाता थे। उन्होंने वन संरक्षण के लिए केवल उपदेश ही नहीं दिए वरन जगह-जगह पर स्वयं भी पौधे लगाए और लोगों को वृक्षों की रक्षा के लिए सर्वस्व बलिदान करने का अमर संदेश दिया। कालान्तर में उनके 363 अनुयायियों  ने ’’पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिए ही वृक्षों की रक्षार्थ’’ हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दी, जो  विश्व में अपनी तरह की एक मात्रा अद्वितीय घटना है। तत्कालीन जोधपुररियासतमेंविक्रम संवत् 1730 में महाराजा अभय सिंह के शासन काल में गांव खेजड़ली के हरे वृक्ष काटने का आदेश दिया। बिश्नोईयों ने विरोध किया, लेकिन उनकेभंडारी के नहीं माने पर अमृता देवी के आह्वान पर बिश्नोई समाज के स्त्राी-पुरुष व बच्चे वृक्षों की रक्षार्थ वृक्षों के चिपक गए। रियासत के आदमियों ने वृक्षों से चिपके363 बिश्नोइयों पर कुल्हाड़ियां चला दी। इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलने पर महाराजा अभय सिंह को स्वयं घटना स्थल पर आकर वृक्ष कटाई बंद करवानी पड़ी। उस जगह का हृदय विदारक दृश्य देखकर महाराजा को आत्म ग्लानि हुई और उन्होंने राज हुक्म जारी करके भविष्य में जोधपुर रियासत में हरे वृक्षों की कटाई पर पाबंदी लगादी। भारत सरकार ने उन 363 शहीदों की याद में सन् 1989 में गांव खेजड़ली (जिला जोधपुर) में एक राष्ट्रीय स्मारक बनवाया और इससे पूर्व 5 जून 1988 को ’’ विश्व पर्यावरण दिवस’’ के अवसर पर खेजड़ली के बलिदान को यादगार बनाने के लिए खेजड़ी वृक्ष पर एक बहुरंगी डाकटिकट भी जारी किया।
 
 
 
 
 
 

 

Share this news

Post your comment