Thursday, 22 August 2019
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लालीवाव मठ में श्रीमद्भागवत सप्ताह सम्पन्न

अनुष्ठानों, कथा व यज्ञ में सैकडों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया, प्रेम करने वाले लोग ही भगवान को प्रिय - हरिओमशरणदास महाराज

बांसवाडा, २८ जुलाई/ यहां ऐतिहासिक एवं प्राचीनतम लालीवाव मठ म चल रहा श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ शनिवार को सैकडों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में विभिन्न अनुष्ठानों, संकीर्तन सत्संग, कथाश्रवण और यज्ञ आदि आयोजनों के साथ सम्पन्नहो गया।
विष्णु महायज्ञ पूर्णाहुति में उमडे श्रद्धालु
 मठ परिसर में बडी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी में लालीवाव मठाधीश, महन्त हरिओमश् ारणदास महाराज के सान्निध्य में हुए विष्णु महायज्ञ में मुख्य यजमान के रूप में पं. कुंजबिहारीदत्त आचार्य एवं पं. विमल भट्ट ने सपत्नीक वैदिक ऋचाओं और पौराणिक मंत्रों के साथ यज्ञ में घृताहुति के बाद पूर्णाहुति समर्पित की। यज्ञ विधान एवं महाविष्ण का राजोपचार से पूजन-अनुष्ठान पं. इच्छाशंकर जोशी, पं. विष्णु भट्ट तथा पं. गिरीश पण्ड्या के आचार्यत्व में हुआ।
 यज्ञपूर्णाहुति के अवसर पर प्राच्यविद्यामर्मज्ञ एवं गायत्री मण्डल के अध्यक्ष ब्रह्मर्षि पं. महादेव शुक्ल, भारतमाता मन्दिर के महन्त एवं जाने-माने आध्यात्मिक चिन्तक रामस्वरूप  महाराज, पूर्व पुलिस उपाधीक्षक श्रीधर जोशी, समाजसेवी भगवत पुरी एड्वोकेट, पार्षद सीता डामोर सहित अनेक जन प्रतिनिधि, कई संत-महात्माओं, गणमान्य नागरिकों और सैकडों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
दिन भर चले अनुष्ठान
श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन शनिवार को दिन भर विभिन्न अनुष्ठानों का दौर चलता रहा। इसके अन्तर्गत विष्णु सहस्रनाम, पुरुष सूक्त आदि के अलावा विष्णु सहस्रनामावलि, द्वादशाक्षर विष्णु महामंत्र, नवग्रह आदि का शास्त्रोक्त विधिविधान से विभिन्न समिधाओंे और घृत के साथहवन हुआ।  महाविष्णु की राजोपचार से पूजा विधि, रूद्र पूजा, स्थापित देवताओं का पूजन, मंत्र जप आदि अनेक अनुष्ठान हुए। इनमें पंडतों, यजमानों तथा साधकों ने हिस्सा लिया।
भागवत कथा में पसरा रहा आनंद
श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के अन्तिम दिन
भागवताचार्य, लालीवाव मठाधीश हरिओमशरणदास महाराज ने श्रीमद्भागवत की महत्वपूर्ण कथाओं को वर्तमान समय की प्रासंगिकता के साथ जोड कर रोचकता और माधुर्य के साथ कथा का रसास्वादन कराया।
 महन्तश्री ने शनिवार को कथा के दौरान् कंस वध, सुदामा मैत्री चरित्र, इन्द्र का मान-मर्दन, रासोत्सव, जरासंघ युद्ध, बलराम विवाह आदि अनेक कथाओं का श्रवण कराया।
 श्रीमद्भागवतमर्मज्ञ हरिओमश् ारणदास महाराज ने सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता के प्रसंग को जीवन्तता के साथ अभिव्यक्ति दी और कहा कि इस आदर्श मैत्री का अनुसरण करना चाहिए।
 उन्होंने कहा कि मित्रता में किसी प्रकार का भेदभाव या कपट नहीं होना चाहिए। जैसे दूध में पानी मिलाओ या पानी में दूध, दोनों परस्पर समरस और अभेद हो जाते हैं। मैत्री सामाजिक समरसता का पैगाम देती है।
 सुदामा के जीवन से प्रेरणा पाने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जिसके पास संतोषरूपी धन है वह सबसे बडा संतुष्ट व्यक्ति है। यही भागवत का संदेश है।
 उन्होंने प्रेम और मैत्री को जीवनयापन की आदर्श आचार संहिता बताते हुए कहा कि भगवान सरल,सहज हैं। उनके लिए कोई लौकिक भेद मायने नहीं रखता। भगवान का स्मरण सामाजिक समरसता और सहजता को परिपुष्ट करता है।
 उन्हने कहा कि प्रत्येक प्राणी और जगत में ईश्वर के दर्शन करना ही परम भागवत का प्रमुख लक्षण है।  ईश्वर के रूप में जगत को और जगत के रूप में ईश्वर को देखना चाहिए।
 महाराजश्री ने प्रेम को जीवन निर्माण और आनन्द का महास्रोत बताया और कहा कि जहां प्रेम है वहीं आनंद और प्रभु का निवास है। प्रेम में किसी भी प्रकार का भेद नहीं होता। प्रेम द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाता है और यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। जो लोग प्रेम करते हैं वे भगवान को अत्यन्त प्रिय हैं वहीं उनके जीवन में माधुर्य, सरलता, सहजता, निष्कपटता आदि गुण कूट-कूट कर भरने लगते हैं। प्र्रेम में किसी भी प्रकार के नियम न होने पर भी मनुष्य दिव्य, शालीन और मधुर अनुशासन से बंधा रहता है।
 महन्तश्री ने कहा कि निरहंकार जीवन्तता का आभास कराता है जबकि अहंकार जडता और अंधेरे का सूचक है। इसलिए अहंकार को जीवन से प्रयत्नपूर्वक समाप्त करना चाहिए।
 उन्होंने श्रीकृष्ण एवं गोपिकाओं के महारास की व्याख्या करते हुए इसके आध्यात्मिक एवं अलौकिक दर्शन पर प्रवचन करते हुए कहा कि जीवात्मा के परमात्मा से मिलन का अभूतपूर्व आनंद ही वस्तुतः रास है। यह रास जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आनंद की रस वृष्टि करता है। इसलिए जीवन का कोई क्ष् ाण और कोई कर्म ऐसा न हो जिसमें परमात्मा का स्मरण न हो। परमात्मा का स्मरण ही आनंद और सफलता का केन्द्र है।
 भजनों की गंगा में नहाए भक्तगण
 श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन कथा के दौरान् भजनगायकों और कलाकारों ने भजन प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।   इन कलाकारों ने ’’कृष्ण गोविन्द, गोविन्द, गोपाला...‘‘ तथा ’’अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो, द्वार तुम्हारे गरीब आया...‘‘ आदि भजन सुनाये।

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