Home > Article >> Current Issue | मानसिक सशक्तिकरण बिना महिला उत्थान नहीं
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05 Mar 2010 Add comment Mail
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सनातन काल से हम कलयुग में आ गए और इस लम्बी अवधि में हमारे लिए सन्तोष की बात यह है कि हमने हर युग में जगत जननी नारी को पूजनीय माना है और आज भी इस सत्य को हम स्वीकार करते हैं कि नारी बिना हम कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद कटु सत्य यह भी है कि दुनिया की आधी आबादी समाज में अपना वह मुकाम हासिल नहीं कर पाई है जिसकी वे हकदार है। यह समाज के लिए चिन्तनीय है कि घर और अब बाहर भी सत्ता की कमान आधी आबादी के हाथ में है फिर भी वह अपना यथोचित स्थान क्यों नहीं पा रही है ?
आज महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में पुरूष के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रही है। वो वह सब कुछ करने में सक्षम हैं जो पुरूष करता आ रहा है फिर भी उसकी पुकार यही आती है कि ‘मैं अबला हूं’ इसलिए मुझ पर जुल्म होते है। लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। दुःख इस बात का है कि आए दिन सामने आ रहे महिला प्रताडना सम्बन्धी समाचारों के लिए पुरूषें को जिम्मेदार ठहराया जाता है जबकि घरेलू या बाहरी हिंसा झेल रही महिला आज इस स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेदार है। यह सत्य है कि महिलाएं पुरूष के जरिये ही प्रताडित होती रही है लेकिन इसमें भी कहीं कोई संशय नहीं है कि पुरूष तो एक साधन मात्र है बल्कि पुरूष को इस स्थिति के लिए महिला ही तैयार करती है। चाहे द्रोपदी का चीर हरण हो या सीता मैया की अग्नि परीक्षा हो या फिर कलयुग में क्षेत्र विशेष या जाति विशेष में कन्या भूण हत्या के मामले हो हर जगह अत्याचारी पुरूष के पीछे कोई ना कोई दूसरी महिला खडी मिलेगी लेकिन कोई भी महिला पुरूष को रोकने का प्रयास भी नहीं करती है। द्रोपदी के चीर हरण के दौरान गान्धारी थी तो सीता की अग्नि परीक्षा के दौरान हजारों महिलाएं तमाशा देखती रही। आज की बात करें तो अस्पतालों व घरों में कन्या भूण की हत्या कोई पुरूष नहीं बल्कि महिला चिकित्सक या दाई ही करती है इसके लिए उस महिला चिकित्सक या दाई को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता है। आज भी देश के क्षेत्र विशेष या जाति विशेष में किसी भी महिला पर होने वाली घरेलू हिंसा घर की सभी औरतों के सामने होती है लेकिन कोई कुछ नहीं बोलती है और दोष अत्याचार करने के साधन बने पुरूषों पर मढा जाता है।
महिला सशक्तिकरण की बातें करने वाली महिलाओं से महिलाओं को इस बात का जवाब मांगना चाहिए कि द्रोपदी हो या सीता या फिर आज की बांग्लादेशी तस्लीमा या म्यांमार की सू की हो इनके बचाव के लिए कितनी महिलाएं खडी हुई है ? सवाल इस बात का है कि आधी आबादी को ‘अबला’ शब्द से मुक्ति दिलाने के लिए इसी आधी आबादी ने क्या किया ? शब्द से मुक्ति दिलाने के लिए इसी आधी आबादी ने क्या किया ? क्यों घरेलू हिंसा से पीडित को बचाने घर की दूसरी महिलाएं आगे नहीं आती है ? इन सवालों के जवाबों के रूप में कहा यह जाता है कि हमें परम्पराओं व रिश्तों को बनाए रखने के लिए चुप करा दिया जाता है। जबकि हकीकत यह नहीं बल्कि यह है कि घर की बागडोर अपने हाथों में रखने के लिए कभी सास-कभी जेठानी तो कभी बडी बहने तक पुरूष रिश्तों के जरिये अपनी ही आधी आबादी को प्रताडित करवाती है। यह सनातन काल से बदस्तूर आज भी जारी है। जो महिला सशक्त (किसी भी क्षेत्र में) हो जाती है तो फिर वह अपने बराबर दूसरी महिला को खडा नहीं देखना चाहती है और यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद आज भी आधी आबादी सशक्त नहीं हो पाई है। महिला सशक्तिकरण के लिए महिला शिक्षा को बढावा, कानूनों में संशोधन या सत्ता में भागीदारी के अनेक जतन किये जा रहे है जो ठीक कहे जा सकते है और होने भी चाहिए लेकिन फिर भी प्रताडना की परम्पराओं का ग्राफ कम नहीं हो रहा है। इस ग्राफ को शून्य किया जाना तो सम्भव नहीं है लेकिन शून्य के आसपास लाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी यह है कि महिलाओं का मानसिक सशक्तिकरण किया जाना चाहिए। घर की सत्ता को एक महिला जो अशिक्षित है बेहतर ढंग से चला सकती है तो फिर बाहर अपनी सत्ता बेहतर क्यों नहीं चला सकती है? चला सकती है बशर्त घर हो या बाहर महिलाओं को ‘संघे शक्ति’ व ‘सहकार’ के सिद्धान्त पर चलना होगा। आज कोई एक महिला ताकतवर हो जाती है तो उसे अपनी यात्रा अपने पर ही समाप्त नहीं करनी चाहिए बल्कि उसे समस्त आधी आबादी को अपने समकक्ष खडा करना चाहिए। यानि कि महिलाओं को ही महिलाओं में अपने वजूद को तलाशना चाहिए तो ही सही मायने में ‘महिला सशक्तिकरण’ सम्भव हो पाएगा अन्यथा तो कुछ सशक्त महिलाएं भले आधी आबादी को शिक्षित करवा दें या भले सत्ता में महिला भागीदारी को सुनिश्चित कर लेवें लेकिन महिलाओं का मानसिक सशक्तिकरण ही होगा तब तक प्रताडना का सिलसिला यूं ही आने वाले युगों में भी चलता रहेगा। आधी आबादी को अपने कमजोर होने की मानसिकता को दूर करना होगा।
भुवनेश व्यास, चित्तौडगढ (राज.) |
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