एक फकीर बगदाद शहर में इकतारा बजाते हुए घूम रहा थां अचानक उसके पांव में एक कील चुभ गई। कील चुभने से एक लंबी आह के साथ फकीर अपना पांव पकड कर रास्ते में ही बैठ गया। उसके पांव से लगातार खून बह रहा था। भक्तों की भीड फकीर के पास इक्ट्ठी हो गई। देखते ही देखते एक भक्त हकीम को बुला लाया। हकीम ने कील निकालने के लिए ज्योंही अपना हाथ बढाया, पांव छूते ही फकीर दर्द के मारे चीख पडा। हकीम कहने लगा - अभी तो मैंने कील के हाथ भी नहीं लगाया है। कील निकाले बिना मैं पट्टी करूंगा भी कैसे ? आप थोड-सा मन को मजबूत कर लीजिए। मैं अभी कील निकाल देता हूं। फकीर ने कहा- इस समय मन को मजबूत रखना मेरे वश की बात नहीं है। हकीम ने कहा - कील निकाले बिना कोई रास्ता भी नहीं है।
पास खडे एक भक्त ने हकीम से कहा - आप एक काम करें, चार बजे ये नमाज पढेंगे, उस समय कील निकाल देना। हकीम ने आश्चर्य से पूछा - जो आदमी हाथ नहीं लगाने दे रहा है वह नमाज भी पढ पाएगा या नहीं। भक्त ने कहा - मैं जानता हूं कि जब उस्ताद खुदा की इबादत में रहेंगे उस समय आप इनकी कील निकाल देना। वैसा ही किय गया। फकीर ने उफ तक नहीं किया। बस नमाज के बाद इतना सा पूछा- क्या कील निकल गई ? जो फकीर कील के छूने मात्र से चीख पडा था। उसे पता नहीं चला कि कील कब निकल गई। हकीम ने इसका राज जानना चाहा, फकीर ने कहा - पहले मैं अपने शरीर में था इसलिए मुझे दुखी कर रहा था। नमाज के वक्त मैं खुदा की इबादत में था। शरीर के बारे में मुझे कोई भान नहीं था। मेरी लगन तो नमाज में लगी थी। हकीम ने सलाम करते हुए कहा - सच्ची लगन से की गई प्रार्थना ही सच्ची प्रार्थना है।
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