Saturday, 16 October 2021

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वागड़ को जीवनी शक्ति से सींचा सन्त परम्परा ने


भारतीय दर्शन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ माने गये हैं। एक सद्गृहस्थ इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति करके समाज में सदाचार पूर्वक जीवन यापन करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर सके, यही भारतीय परम्परा में आध्यात्मिक जीवन का आधार बना।

कालचक्र के थपेड़ों में भारतीय संस्कृति परकीय आक्रमणों से आक्रान्त हुई और कलुषित भी। ज्ञान-विज्ञान  से सम्पन्न भारत विभिन्न आक्रान्ताओं के गुलामी के कालखण्ड में अपनी जाज्वल्यमान छवि को अखण्डित नहीं रख पाया और परिणाम स्वरूप हमारा ज्ञान-विज्ञान क्षत-विक्षत होता गया तथा कालान्तर में यह सब सीमित हाथों में कहीं संचित रहा या लुप्त प्रायः हो गया एवं जनमानस दिग्भ्रमित व किंकत्र्तव्यविमूढ़ सा हो गया।

ऎसे समय मे देश में सदा की भाँति अनेक सुधारकों का कालखण्ड आया और इस देश में संत परम्परा ने देश की आत्मा; संस्कार को लोक जीवन में जागृत करने एवं प्रसारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। कुछ लोगों ने इसे धर्म सुधार आन्दोलन कहा तो किसी ने लोक जागरण का आन्दोलन। कुछ भी हो कुहासे में प्रकाश किरण बन कई सन्त-महन्तों ने लाकोद्धार का कार्य किया। इसमें विभिन्न क्षेत्रोंं में साधु-संतों ने प्रेरक का कार्य किया।

इसी शृंखला में वागड़ क्षेत्र बाँसवाड़ा-डूंगरपुर में भी अनेक सन्त महात्मा हुए जिन्होंने न केवल सुषुप्त संस्कारों का जागरण किया अपितु समाज में शिक्षा, स्वावलम्बन एवं आत्मविश्वास को जगाकर महत् उपकार किया है। जिनके कारण आज समाज में आध्यात्मिक एवं सामाजिक जागृति दिखाई देती है। इनमें प्रमुख सन्तों का वर्णन संक्षेप में इस प्रकार है -

भक्त गोपाल दास जी वैष्णव
‘‘चौरासी वैष्णवों की वार्ता’’ नामक ग्रंथ में भक्त गोपाल दास जी के जीवन का परिचय मिलता है। इस ग्रंथ के अनुसार इनका जन्म एक क्षत्रीय परिवार में हुआ था। ग्यारह वर्ष की अल्पायु में जब पिता की आज्ञा पालन हेतु प्रयाग त्रिवेणी संगम पर गये वहाँ आचार्य जी से सम्पर्क हुआ तथा आचार्य महाप्रभु जी के मूल स्वरूप के  दर्शन होते ही उनके शिष्य बन गये एवं जन मानस तक पुष्टि मार्ग (व्रल्लभ सम्प्रदाय) का संचरण किया।

सन्त दयाराम जी
गोस्वामी दयानिधि जी श्री हित हरिवंश जी के वंशज माने जाते थे तथा ‘‘भक्तमाल’’ के रचयिता नागर श्री शिवलाल जी के गुरु थे। आप विभिन्न शास्त्रों के ज्ञाता एवं महारसिक थे, कई पदों की रचना भी की। आपके शिष्यों में डूंगरपुर के तत्कालीन महाराज भी प्रमुख थे। आपने श्री राधावल्लभ जी मन्दिर निर्माण की प्रेरणा दी।

भक्तिमति गवरी बाई
संवत् 1815 में राम नवमी के दिन एक नागर ब्राह्मण परिवार में इस कन्या का जन्म हुआ। साधारण परिवार में जन्मी इस कन्या का नाम गवरी बाई था जिसे आज इतिहास में ‘‘वागड़ की मीरा’’ के नाम से जाना जाता है।
बाल्यावस्था मे वैधव्य प्राप्ति के साथ ही कृष्ण भक्ति में तल्लीन रहने लगी। इनकी भक्ति, ज्ञान, समाधि व योग साधना बड़ी ही चमत्कारी थी। ये तेजस्वी व शान्त स्वभाव की दयालु महिला थी। इन्होने कई लोगों को अपने चमत्कार दिखाए तथा उपदेश दिये। इन्होंने कई पदों की रचना की जो हस्त लिखित पद संग्रह के रूप में डूंगरपुर में स्थित है जिसमें लगभग 652 पद हैं। आज भी डूंगरपुर में शहर के बीचोबीच गवरी बाई का छोटा सा प्राचीन मन्दिर स्थित है।

ग्यान माँजी
ग्यान माँजी का जन्म बाँसवाड़ा के एक भट्ट मेवाड़ा ब्राह्मण कुल में हुआ था। आपने श्री कृष्ण के लाल जी स्वरूप का नाम नवललाल रखा तथा उन्हीं की सेवा पूजा-अर्चना में जीवन व्यतित कर दिया। आपने पदों एवं रास लेखन के माध्यम से जन साधारण को कृष्ण भक्ति की ओर आकृष्ट किया। आज भी इनके पद एवं भजन राधावल्लभ जी नामक मन्दिर में विद्यमान हैं।

केशवाश्रम जी महाराज
महाराज केशवाश्रम जी दक्षिण भारत के कर्णाटक प्रदेश के वीरूपाक्ष गाँव के रहने वाले थे। इनके पिता का नाम महेश्वर तथा माता का नाम गंगा देवी था। इनके बचपन का नाम चन्द्रेश्वर था। तीक्ष्ण बुद्धिधारी श्री महाराज ने बाल्यावस्था में ही सर्व शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था।
बाँसवाड़ा को कर्मस्थली बना दिगम्बर नग्न स्वरूप में प्रथम दर्शन दिये। इन्होंने धर्मोपदेश दिये तथा लोगों को ईश्वर भक्ति का मार्ग दिखाया। तत्कालीन महारावल लक्ष्मण सिंह को पथभ्रष्ट होने से बचाया तथा धर्म की स्थापना की। सद्गुरु ने गढ़ी के निकट पारसोलिया गाँव को अपना निवास बनाया तथा सर्वेश्वर शिवलिंग की स्थापना की। आज भी वहाँ शिला पर उनके चरण चिह्व अंकित हैं।

संत मावजी
संवत् 1784 में माघ शुक्ला एकादशी सोमवार को डूंगरपुर में दालम ऋषि के यहाँ आपका जन्म हुआ। आपकी माता का नाम केशर बाई था। वागड़ के पवित्र त्रिवेणी संगम स्थल बेणेश्वर को अपना धाम बनाया। बाल्यावस्था से ही आपमें चमत्कारी महापुरुष के लक्षण दृष्टिगोचर होने तथा भविष्यवाणियाँ सत्य साबित होने लगी।
श्रीकृष्ण व श्री माव मनोहर के चरित्र व लीला में अद्भुत साम्य दृष्टिगत होता है। इसी कारण इन्हें श्रीकृष्ण का ही अवतार माना गया है।  इन्होंने कई ग्रंथ लिखे व भविष्यवाणियाँ भी की जो अक्षरक्षः सत्य सिद्ध हो रही है।
आदिवासी जनता आज भी इन्हें भगवान स्वरूप ही पूजती है। इस समाज में फैली अनेकों कुरीतियों को दूर करने का श्रेय इन्हें ही जाता है। इन्होंने अपने भक्तों को हिंसा न करने, मद्यपान नहीं करने तथा प्रत्येक जीवात्मा को समान समझने की शिक्षा दी। आज भी इनके भक्त श्वेत वस्त्र धारण कर धर्म की ध्वजा लहराते हैं और इनकी शिक्षाओं का पालन करते हुए अपना जीवन सादगी तथा स्वच्छता से व्यतीत करते हैं।

सद्गुरु भैरवानन्द जी
सद्गुरु भैरवानन्द जी बाँसवाड़ा के तलवाड़ा गाँव के रहने वाले थे। जाति से औदिच्य थे किन्तु किसी ओघड़ बाबा के सम्पर्क में आने से उनका आचरण विचित्र सा हो गया था। आपका केवल मनुष्यों ही नहीं वरन् प्राणी मात्र के प्रति करूणा का भाव था। आपने यही शिक्षा अपने पास आने वाले श्रद्धालुओं को भी दी।
सद्गुरु बाँसवाड़ा में नागरवाड़ा में मन्छादेवी के निकट एक मकान में रहने लगे। ये बटुक भैरव के उपासक थे। सभी प्रकार की सिद्धियाँ उनके पास थी। फिर भी आप लोगों को माया महाठगीनी से दूर रहने की शिक्षा देते थे। वे वाममार्गी उपासक थे तथा कई बार अपने भक्तों को चमत्कार भी दिखाए।  आपने सम्पूर्ण भारतवर्ष के तीथों का भ्रमण किया तथा 1890 में पुनः बाँसवाड़ा पदार्पण किया। इन्होंने 1914 में जीवित समाधि ली।

स्वामी रामानन्द जी सरस्वती
स्वामी रामानन्द सरस्वती वेदांती थे। आपने बाँसवाड़ा में धर्मभाव का प्रसार करने में अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत कर दिया। आप बाँसवाड़ा शहर के मोहन कॉलोनी स्थित नाथजी महाराज की टेकरी पर आश्रम बनाकर रहते थे। आपने ज्ञान, ध्यान एवं साधना के साथ साथ वेदांत एवं संस्कृत की शिक्षा काशी विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी।

स्वामी रामानन्द सरस्वती का जन्म 1910 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर के कुरथल गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम हुकमचंद पाण्डे था। आपकी माता का नाम नादरी तथा पिता का नाम मंगल पाण्डे था। नौकरी करते करते अचानक वैराग्य उत्पन्न हो गया और वे घर बार छोड़कर साधु सन्तों के साथ घुमने लगे। सन् 1936 में जंगलों में भ्रमण करते हुए आप बाँसवाड़ा आए। यहीं रहकर उन्होंने अपने अध्ययन का कार्य सम्पन्न किया तथा स्वयं अध्यापन को बढ़ावा दिया। आपने शिष्यों को प्रोत्साहन देने के लिये निःशुल्क आवास एवं भोजन की व्यवस्था उपलब्ध करवाई।
आपने बाँसवाड़ा में ग्राम ग्राम भ्रमण कर ज्ञान की ज्योति जलाई। आपने बाँसवाड़ा नगर में गीता सत्संग मण्डल की स्थापना की एवं सम्पूर्ण जिले में गीता, रामायण एवं भागवत की कथाओं के माध्यम से जन जन में आध्यात्मिक उन्नति का भाव पैदा किया। आज भी उनके आश्रम में यथावत् प्रत्येक रविवार को रामचरित मानस, गीता एवं भागवत का पाठ किया जाता है।

वागड़ के इन सन्तों ने अपना जीवन लोकोद्धार के लिये समर्पित कर दिया। लुप्त होती हुई भारतीय संस्कृति को फिर से जागृत कर जनमानस में शिक्षा, प्रेम, सदाचरण एवं अध्यात्म को पुनस्र्थापित किया। इन सन्त महात्माओं के कारण ही आज सर्वत्र आध्यात्मिक वातावरण दिखाई देता है। इसे निर्मित करने में आपने सर्वस्व समर्पण कर दिया। आपके दिखाए गए मार्ग पर चलकर आज कई लोगों के जीवन में सर्वांगीण उन्नति दिखाई देती है। इन सबका योगदान अतुलनीय है और आज के भौतिकवादी युग में एक प्रकाश स्तम्भ में दीपित अनेकों दीपकों की रोशनी से इस वागड़ अंचल को प्रकाशित कर रहा है।

- सीमा वैष्णव