Monday, 12 April 2021

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कलाम की तलाशीः सुलगते सवाल


Tanveer Jafari तनवीर जाफरी

कौंटिनेंटल एयरलाईंज नामक अमेरिकी विमान कंपनी के सुरक्षाकर्मियों द्वारा गत् 21 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम की उस समय गहन तलाशी ली गई जबकि वे अपनी अमेरिका यात्रा शुरु करने जा रहे थे। डॉ कलाम ने अपने चिर-परिचित विनम्र स्वभाव, उदारता व सहजता का परिचय देते हुए अमेरिकी सुरक्षा कंपनी द्वारा निर्देशित सभी सुरक्षा मापदंडों का पूरा पालन किया। जबकि दूसरी ओर इस अमेरिकी जांच कंपनी के कर्मचारियों ने पूर्व भारतीय राष्ट्रपति डॉ कलाम के प्रति पूरे अविश्वास का परिचय देते हुए उनकी साधारण या शायद उससे भी घटिया तरीके से तलाशी ली। कलाम के जूते उतरवाए गए तथा जूतों की ऐसे जांच की गई गोया इनमें कोई बम या मादक पदार्थ रखे गए हों। उनकी जेब, पर्स यहां तक कि मोबाईल तक की गहन जांच की गई। निःसंदेह डॉ कलाम इस समय आम भारतीयों के लिए सबसे महान आदर्श पुरुष हैं। वे एक महान वैज्ञानिक, मिसाईल मैन, भारत रत्न होने के साथ-साथ जनता के राष्ट्रपति के रूप में भी देखे जाते हैं। अतः उनके साथ भारत की राजधानी में एक अमेरिकी विमानन कंपनी के सुरक्षाकर्मियों द्वारा तलाशी लिए जाने पर आम भारतीयों में क्रोध व उत्तेजना का पैदा होना निश्चित रूप से एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। खासतौर पर आम लोगों में यह जानकर अधिक गुस्सा पैदा हुआ है कि सुरक्षाकर्मियों ने डॉ कलाम का पूर्व भारतीय राष्ट्रपति के रूप में परिचय पाने के बावजूद ऐसा क्यों किया। कलाम के तलाशी प्रकरण को लेकर देश में अच्छी खासी बहस छिड गई है। यहां तक कि भारतीय संसद में भी इस विषय पर काफी हंगामा हुआ है। इस प्रकरण को लेकर तरह-तरह के मत व्यक्त किए जा रहे हैं।

हालांकि कौंटिनेंटल एयरलाईंज द्वारा इस विषय पर डॉ कलाम से माफी मांगने की बात कहकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है। परन्तु आम भारतीय यह सवाल जरूर कर रहा है कि आखिर डॉ कलाम की तलाशी सुरक्षा मापदंडों के तहत ली गई है या भारत को नीचा दिखाने का यह एक चिर-परिचित तरीका था। जब अमेरिकी सुरक्षा कंपनी अपने बचाव में यह बात कहती है कि उसने अपने सुरक्षा मापदंडों के अन्तर्गत ही डॉ कलाम की तलाशी ली तो भारतीय जनता को निश्चित रूप से इस कंपनी से यह पूछने का अधिकार है कि क्या यह कंपनी जॉर्ज बुश तथा बिल क्लिंटन जैसे अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपतियों की भी इसी प्रकार और इसी अंदाज से तलाशी ले चुकी है। यदि हां तो इस कंपनी को इसके प्रमाण देने होंगे। यदि यह कंपनी ऐसे प्रमाण उपलब्ध करा देती है तो निश्चित रूप से भारतीय नागरिक इस अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी की कर्त्तव्य पालना के कायल हो जाएंगे। और यदि यह मापदंड बुश व क्लिंटन जैसे अमेरिका पूर्व राष्ट्रपतियों के अतिरिक्त अन्य अति विशिष्टि लेागों के लिए हैं तो निःसंदेह यह आपत्तिजनक है तथा भारत जैसा देश इसे अपनी तौहीन समझता है।

कलाम के तलाशी प्रकरण को लेकर कुछ तकनीकी एवं विरोधाभासी खामियां भी दिखाई दे रही हैं। जैसे कि भारतीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी की गई अति विशिष्ट लोगों की वह सूची जिसमें सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत जिन विशिष्ट लोगों को साधारण सुरक्षा दायरे से मुक्त रखा गया है, उनमें अन्य अतिविशिष्ट व्यक्तियों के अतिरिक्त भारत के पूर्व राष्ट्रपति भी शामिल हैं। जबकि कौंटिनेंटल एयरलाईंज को सुरक्षा देने वाली अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी की ओर से उसे मिलने वाली प्रोटोकॉल सूची में भारत के पूर्व राष्ट्रपति का नाम नहीं है। अब प्रश्ा* यह है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी किस प्रोटोकॉल सूची का पालन करे। भारतीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा जारी प्रोटोकॉल सूची का या अपनी कंपनी द्वारा उपलब्ध कराई गई सूची का?

9/11 जैसे आतंकी हमले के बाद बुरी तरह से भयभीत अमेरिका अब इतना चौकस हो गया है कि उसे हर समय हर ओर से आतंकी हमले का भय सताए रहता है। शायद उसकी इसी जबरदस्त चौकसी का ही परिणाम है कि आतंकियों की तमाम साजिशों के बावजूद 9/11 के बाद आज तक अमेरिका पर दूसरा कोई आतंकी हमला नहीं हुआ। परन्तु इस चौकसी की आड में अन्य देशों के अतिविशिष्ट व्यक्तियों को अपमानित भी नहीं किया जाना चाहिए। 2003 में भी भारतीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की अमेरिका में कपडे उतरवाकर दो बार तलाशी ली गई थी। गत् वर्ष अक्तूबर में भारतीय लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने अपनी लंदन यात्रा केवल इसलिए रद्द कर दी थी क्योंकि हीथ्रो हवाईअड्डे पर उनकी तलाशी ली जानी थी। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को भी गत् वर्ष अपनी मॉस्को यात्रा के दौरान जांच दायरे से होकर गुजरना पडा था। सवाल यह है कि जब भारत के अतिविशिष्ट व्यक्तियों पर दुनिया के स्वयं को असुरक्षित महसूस करने वाले देश विश्वास नहीं करते फिर आखिर भारत सरकार भी सुरक्षा के वैसे ही कडे मापदंड क्यों नहीं अपनाती? हमारे देश में भी भारतीय संसद आतंकियों का निशाना बन चुकी है। मुंबई हमलों के बाद और भी स्पष्ट हो गया कि देश का कोई भी अतिसुरक्षित अथवा संवेदनशील स्थान आतंकियों के निशाने से अछूता नहीं है। ऐसे में भारत को भी अपने सुरक्षा मापदंड वैसे ही कडे कर देने चाहिए। फिर चाहे हमारे देश में हिलेरी क्लिंटन आएं या बिल क्लिंटन, हमें उनके साथ भी सुरक्षा के वही मापदंड अपनाने चाहिएं जोकि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी डॉ कलाम जैसे भारतीय नेताओं के साथ अपनाती है।

भारतीय संसद में भी कलाम के तलाशी प्रकरण पर अच्छा खासा हंगामा हुआ। एक सांसद ने कलाम को राष्ट्र का गौरव बताते हुए उनके तलाशी प्रकरण को पूरे देश का अपमान बताया। वामपंथी सांसद सीताराम येचुरी ने तो सदन में साफतौर से यह आरोप लगाया कि चूंकि उनके नाम के साथ अब्दुल शब्द लगा था इसलिए उनकी तलाशी ली गई। येचुरी के कहने का मतलब साफ था कि चूंकि डॉ कलाम मुस्लिम थे इसलिए शक की बिना पर अमेरिकी एजेंसियों ने उन्हें अपमानित किया। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने डॉ कलाम की तलाशी उनके नाम के परिणामस्वरूप ली अथवा यह उनका नियमित जांच तरीका था? यह अलग बात है। परन्तु इस बात से तो इन्कार किया ही नहीं जा सकता कि 9/11 के बाद अमेरिका में मुस्लिम समुदाय के लोगों को संदेह की नजर से देखा जाने लगा है। भारत के कई अत्यन्त प्रतिष्ठित मुस्लिम विद्वानों को अमेरिका पहुंचने के बाद वहां के हवाईअड्डे से ही भारत वापस भेजा जा चुका है। ऐसी कई घटनाएं सुनी जा चुकी हैं जिनसे यह पता चलता है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां मुस्लिम नाम रखने वालों, इस्लामी तौर तरीके का पहनावा धारण करने वालों या दाढी रखने वालों के साथ विशेष सुरक्षा उपाय अपनाती हैं तथा उनपर अपनी पैनी नजर रखती हैं। अब यहां एक प्रश्न यह भी है कि मुसलमानों को इस संदेहपूर्ण स्थिति तक पहुंचाने का जिम्मेदार कौन है?

इस प्रकरण पर एक और अंतिम बात यह जरूर कहना चाहूंगा कि उपरोक्त सभी वास्तविकताओं के बावजूद यह भी एक बडी सच्चाई है कि हमारे नेता ऐसे मुद्दों की गहरी तलाश में रहते हैं जोकि उन्हें राजनीति करने का अवसर दे सकें। शायद इस मामले में भी कुछ ऐसा ही है। तलाशी प्रकरण ने स्वयं डॉ कलाम को शायद इतना आहत नहीं किया होगा जितना कि हमारे देश के कुछ नेता इस मामले से आहत दिखाई दिए हैं। नेताओं द्वारा ही डॉ कलाम की तलाशी पर विरोधस्वरूप जो शब्द अपनाए गए, उसमें इस घटना को देश का अपमान, भारतीय स्वाभिमान पर हमला, देश का अनादर, दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का अपमान और न जाने क्या-क्या बताया गया। हमें याद रखना चाहिए कि भारत वह देश है जहां मान व अपमान की चिंता किए बिना क्या राष्ट्रपति तो क्या प्रधानमंत्री सभी पंक्तिबद्घ होकर मतदान करते हैं। डॉ मनमोहन सिंह जैसे भारतीय प्रधानमंत्री ने लाईन में खडे होकर अपना ड्राइविंग लाईसेंस नवनीकरण करवाने में कोई अपमान महसूस नहीं किया।

दरअसल देश और देशवासी स्वयं को उस समय अधिक अपमानित महसूस करते हैं, जब भारतीय नेता विदेशों में जाकर गरीबों से लूटा हुआ काला धन जमा कराते हैं। देश स्वयं को तब अधिक अपमानित महसूस करता है जब किसी राष्ट्रीय राजनैतिक दल का प्रमुख अथवा कोई केंद्रीय मंत्री रिश्वत की रकम हाथों में लिए हुए कैमरे के सामने रंगेहाथों पकडा जाता है। देश उस समय अपनी तौहीन जरूर महसूस करता है, जब संसद भवन में सांसदों द्वारा नोट के बंडल उछाले जाते हैं। देश के लिए वह अधिक अपमानजनक घडी होती है जब कोई सांसद सदन में प्रश्न पूछने के बदले रिश्वत वसूलता है। देश और देशवासी उस समय वास्तव में अपना सिर शर्म से झुका महसूस करते हैं जबकि भारतीय संसद में भ्रष्ट, चोर उचक्के, अपराधी तथा माफिया चुनावों में विजयी होकर संसद की गरिमा पर धब्बा लगाते हैं। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को क्या कहा जाए, यह तो शायद अमेरिका की नीतियों में शामिल हैं कि वे स्वयं चाहे किसी पर विश्वास करें या न करें, परन्तु उनपर सबको विश्वास करना ही होगा। यदि अमेरिकी सोच ऐसी न होती तो वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की राजघाट स्थित समाधि पर अमेरिकी कुत्तों से तलाशी न करवाते। वैसे भी जब कभी भी कोई अमेरिकी विशिष्ट या अतिविशिष्ट व्यक्ति भारत आता है तो उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी भी अमेरिका स्वयं उठाता है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को तो तीसरे घेरे में शामिल किया जाता है। विश्वास और अविश्वास के इस अंतर को बदलने के लिए ठोस कदम उठाने, भरपूर इच्छाशक्ति दिखाने तथा दुम हिलाने की प्रवृत्ति को त्यागने की सख्त जरूरत है।