भारतवर्ष को स्वाधीन हुए हालांकि 60 वर्ष बीत चुके हैं परन्तु अभी भी इस देश में ऐसी अनेकों घटनाएं होती रहती हैं जोकि हमारी नीयत, कार्यक्षमता, कार्यशैली यहां तक कि हमारी राष्ट्रभक्ति तक पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। उदाहरण के तौर पर सरकारी प्रबंधन की कमियों के चलते किन्हीं क्षेत्रों में यदि बाढ या सूखे जैसे प्रकोप की स्थिति उत्पन्न होती है तथा उस स्थिति का सामना करने के लिए सरकार अथवा गैर सरकारी संगठनों द्वारा बाढ या सूखा पीडित लोगों की सहायतार्थ कुछ राहत सामग्री अथवा धनराशि मुहैया कराई जाती है तो अधिकांशतयः ऐसे स्थानों से यह समाचार सुनने को मिलता है कि राहत सामग्री अथवा नकद धनराशि के आबंटन में सरेआम धांधलीबाजी की जा रही है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस देश में भ्रष्टाचार की जडें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को यह तक दिखाई नहीं देता कि प्रभावित व्यक्ति किस हद तक जरूरतमंद है।
भ्रष्टाचार की इसी प्रवृत्ति ने देश में मिलावट का जहर भी घोल रखा है। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर जीवन रक्षक दवाईयां, रोजमर्रा प्रयोग में आने वाली तमाम वस्तुएं, मशीनरी के कलपुर्जे आदि सभी में मिलावट तथा नकली सामानों की भरमार देखी जा रही है। भ्रष्टाचार की यह बेल काफी समय से निर्माण कार्यों में भी प्रवेश कर चुकी है। सडकें, पुल व सरकारी इमारतों आदि में खुलमखुल्ला भ्रष्टाचार की खबरें अक्सर सुनाई देती हैं। इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ देश को आर्थिक क्षति होती है बल्कि कभी-कभार भ्रष्टाचार के इन कारनामों के परिणामस्वरूप आम लोगों को अपनी जानें भी गंवानी पड जाती हैं।
भ्रष्टाचार के अतिरिक्त भी कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं इस देश में घटित होती हैं जो वास्तव में इन्सान को आश्चर्य में डाल देती हैं। जैसे कि 12 नवम्बर 1996 को हरियाणा राज्य के चरखी दादरी नामक कस्बे के आकाश में 14000 फीट की ऊंचाई पर सऊदी एयरलाईन्स जम्बोजेट और कजाक एयरवेज इल्यूशिन चार्टर प्लेन का आकाश में ही आमने-सामने से टकरा जाना। ज्ञातव्य है कि इस आश्चर्यजनक हादसे में 351 लोग मारे गए थे। मुख्य मार्गों पर चलने वाली कारों, ट्रकों तथा बसों की आमने-सामने से होने वाली टक्कर तो केवल भारत की ही नहीं बल्कि इसे वैश्वक समस्या माना जा सकता है। परन्तु दो बडे यात्री विमानों का 14000 फीट की ऊंचाई पर आमने-सामने से टकरा जाना वास्तव में एक हैरतअंगेज घटना है। परन्तु इस दुर्घटना के पीछे का सत्य यह था कि दुर्घटना के दिनों में भारतीय पायलट हडताल पर थे। विदेशी पायलट्स को भारतीय विमान कम्पनियों द्वारा अपने विमान उडाने हेतु बुलाया गया था। विदेशी विमानों के पायलट तथा ट्रैफिक कन्ट्रोल के मध्य भाषा व संदेशों को समझने में आने वाली समस्या काफी रुकावट डाल रही थी। इसी के परिणामस्वरूप यह दुर्घटना घटित हुई। अर्थात् ए टी सी से संदेश कुछ और दिया गया तथा इत्तेफाक से दोनों ही पायलटों द्वारा भ्रांतिवश उसी संदेश को कुछ और समझा गया। परन्तु इस दुर्घटना के तुरन्त बाद ही पश्चमी देशों द्वारा भारतीय विमानन व्यवस्था का मजाक उडाया जाने लगा। यहां तक कि कई पश्चमी देशों के समाचार पत्रों में भारत को ”बाजीगरों“, ”जादूगरों“ व ”सपेरों“ का देश कहकर सम्बोधित किया गया। और इसी विमान दुर्घटना की आड में कई तथाकथित आधुनिक देशों ने एयर ट्रैफिक कन्ट्रोल से संबंधित अपनी करोडों रुपए की कई आधुनिक मशीनें, सिगन्ल सिस्टम आदि भारत को बेच डाले।
इस प्रकार भारत के पंजाब राज्य में अभी मात्र तीन वर्ष पूर्व ही दो रेलगाडियों की भिडंत आमने-सामने से हो गई। दोनों ही रेलगाडियां एक ही पटरी पर परस्पर विपरीत दिशा से दनदनाती हुई चली आ रही थीं और वे आपस में टकरा गईं। इस हादसे में जान व माल की भारी क्षति हुई थी। पश्चमी मीडिया में इस हादसे का भी मजाक उडाया गया था। वास्तव में यह हादसा था भी रेलकर्मियों की घोर लापरवाही व गैर जिम्मेदारी को उजागर करने वाला। परन्तु भारत जैसे उस विशाल देश में जहां कि विश्व का सबसे बडा रेल जाल फैला हो, इस प्रकार के इक्का-दुक्का हादसे क्या इस बात के लिए काफी होते हैं कि ऐसे हादसों के बाद तत्काल पूरे देश को ”सपेरों“ या ”बाजीगरों“ का देश कहकर पुकारा जाने लगे? क्या लापरवाही, निठल्लेपन या अयोग्यता के यह नजारे केवल भारत में ही दिखाई देते हैं, अन्य देशों में नहीं? भारत के पडोसी देश पाकिस्तान से लेकर विश्व के सबसे आधुनिक, शक्तिशाली व महान समझे जाने वाले अमेरिका जैसे देश में भी ऐसी तमाम घटनाएं होती रहती हैं जिन्हें देखकर हम भी यह कह सकते हैं कि भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया ही ”सपेरों“ या ”बाजीगरों“ की दुनिया है। अभी कुछ दिन पूर्व ही पाकिस्तान के कराची नगर में यातायात का एक बडा पुल उद्घाटन होने के मात्र एक सप्ताह के भीतर ही ढह गया। इस पुल का उद्घाटन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ द्वारा किया गया था। इस विशाल पुल के निर्माण में भारी लागत आई थी तथा प्रतिष्ठित सेतु निर्माण कम्पनी द्वारा इसे बनाया गया था। अचानक हुई इस दुर्घटना में कई लोग मारे भी गए थे। अब ऐसे सेतु निर्माण को जोकि 100 वर्षों के बजाए मात्र एक सप्ताह के भीतर ही अपनी आयु पूरी कर चुका हो इसे क्या कहा जाना चाहिए? क्या यह ”बाजीगरी“ का एक नमूना कहा जाए? इसी प्रकार गत १ अगस्त को अमेरिका के मिनिएपोलिस में मिसीसिपी नदी पर बना एक पुल अचानक ढह गया। इसमें भी काफी लोग हताहत हुए। कहा जाता है कि अमेरिका, ब्रिटेन व और कई ऐसे सम्पन्न देश इस प्रकार के निर्माण के पूरा होने के समय ही निर्माण किए गए प्रोजेक्ट पर उसके समाप्त या अयोग्य होने की तिथि भी अंकित कर देते हैं। आखिर मिसीसिपी के हादसे में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? अमेरिका जैसे देश को स्वयं ”बाजीगरों“ व ”सपेरों“ जैसी राह क्यों तय करनी पडी? अमेरिका तो स्वयं को ”त्रिकालदर्शी“ मानता है। फिर आखिर उस ”त्रिकालदर्शी“ को इस बात का अन्दाजा क्यों नहीं हो सका कि मिसीसिपी नदी पर बना यह ऐतिहासिक पुल जिस पर कि लगभग 5 लाख वाहन प्रतिदिन गुजरते हैं, अचानक किसी भी समय ढह सकता है।
यह तो था अमेरिका महान की इंजीनियरिंग ”बाजीगरी“ का एक छोटा सा उदाहरण। राहत पहुंचाने व दैवी विपदाओं का सामना करने में भी अमेरिका कोई नेपाल या बंगलादेश से अधिक आधुनिक नहीं है। गत् कुछ वर्षों में अमेरिका ने कैटरीना व रीटा जैसे कई समुद्री तूफानों का सामना किया है। इन तूफानों की पूर्व सूचना मिलने के बाद भी अमेरिका अपने देशवासियों को इस प्राकृतिक विपदा के कहर से बचा न सका। यहां तक कि हजारों तूफान पीडितों के मकान उजड गए। तमाम लोग घर से बेघर हो गए। अनेकों अपने रोजगार गंवा बैठे। आज ४ वर्ष बीत जाने के बावजूद उन तूफानों से प्रभावित व पीडित लोगों को न तो ठीक से राहत पहुंच पाई है न ही वे आत्मनिर्भर हो सके हैं। यहां तक कि कैटरीना व रीटा के बाद और भी तूफानों का सिलसिला अमेरिका में जारी है परन्तु प्रभावितों को राहत के नाम पर वही ”बाजीगरों“ व ”सपेरों“ के देश जैसी कारगुजारियां।
ऐसी और भी तमाम बातें हैं जो हमें यह सोचने को बाध्य करती हैं कि केवल भारत को ही ”बाजीगरों“ व ”सपेरों“ का देश नहीं कहा जा सकता बल्कि स्वयं अमेरिका ”महान“ भी इन्हीं देशों की सूची में आता है। अतः इस प्रकार के व्यंग्यबांण चलाने से पहले जरूरी है कि महान देशों द्वारा अपने देश की व्यवस्थाओं पर भी समुचित नजर डाली जाए।
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