Sunday 12 Feb 2012 Sign In   New Member: Sign Up  RSS


Home > Article >> Current Issue
जंग तो खुद एक मसला है जंग क्या मसलों का हल होगी

20 Dec 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor     

Amalendu Upadhyaya - Politcal observer and Independet Writer मुंबई पर आतंकवादी हमले के तुरंत बाद अमरीकी विदेश मंत्री कोंडालिजा राइज भारत के साथ आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाने के लिए भारत आ पहुंचीं।अब यह तो पता नहीं कि अमरीका का साथ भारत को कितना मिलेगा परंतु इतना अवश्य है कि आतंकवादियोें की नजर में भारत अब उतना ही बड़ा निशाना बन गया है जितना अमरीका।
राइज का भारत के साथ खड़ा होना हमें महाभारत के युध्द की याद दिलाता है, जहां श्री कृष्ण स्वयं तो पांडवों के साथ थे और उनकी सेना कौरवों के लिए लड़ रही थी। ठीक उसी तरह अमरीका के हथियार और पैसा  आई एस आई और पाकिस्तान के पास हैं और भारत के पास मनमोहन के मीत बुश हैं।
मुंबई हमले के बाद एक बहस समूचे देश में चल रही है कि अमरीका में 11/9 के बाद कोई आतंकी घटना नहीं हुई परंतु भारत में एक के बाद एक कई घटनाएं हो चुकी हैं, लिहाजा भारत को भी अमरीका से सबक लेकर पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। सुनने में यह विचार बहुत अच्छा है, परंतु कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से एकदम फूहण और बचकाना।
नि:संदेह मृत्यु कष्टकारी है और ऐसे संदर्भ में जब सामूहिक और हत्या के रूप में हो तो मौत विक्षोभ पैदा करती है। लेकिन 11/9 के बाद अमरीका के नेतृत्व में 'आतंक के विरुध्द लड़ाई' के नाम पर जो किया गया है, वह न केवल अमानवीय है बल्कि किसी भी हाल में 11 सितंबर से कम हिंसक और आतंकवादी नहीं है।
11 सितंबर के बाद कई सवाल उभरकर सामने आए हैं, जिनका उत्तर अमरीका की तरफ से आज तक नहीं आया है। विश्व में आतंक के लिए आज जिस इस्लामी फण्डामेंटलिज्म को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वह अमरीका का ही पाला पोसा हुआ है। सोवियत संघ, अफगानिस्तान और पोलैण्ड जैसे साम्यवादी देशों में कम्युनिज्म की समाप्ति के लिए अमरीका ने इन इस्लामिक फण्डामेंटलिस्ट्स को हथियार, पैसा , प्रशिक्षण और गोला बारूद उपलब्ध कराया।
तो अब वे कौन से कारण हैं कि शीत युध्द की समाप्ति के बाद जब दुनिया एक ध्रुवीय हो गई थी और धुरी अमरीका बन गया था व सारी दुनिया पर अमरीका का आर्थिक व सामरिक साम्राज्य स्थापित हो चुका था, तब सारी दुनिया में आतंक पनप रहा है और अमरीका   के ही दिए हथियार तबाही मचा रहे हैं?
गौरतलब है कि पश्चिमी सभ्यता और अमरीका ने अपना आर्थिक साम्राज्य सारी दुनिया पर कायम करने के लिए भूमण्डलीकरण और हथियारों को जरिया बनाया है। सही मायनों में अमरीका की आर्थिक नीतियों के असंतोष से आतंकवाद पनपा है। क्या इस आरोप के समर्थन में एक ही तर्क पर्याप्त नहीं है कि ग्यारह सितंबर को आतंकवादियों ने हमले के लिए 'स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी' को निशाना नहीं बनाया, बल्कि भूमण्डलीकरण के प्रतीक 'विश्व व्यापार केंद्र' एवं सारी दुनिया में आतंक, हत्या और तख्तापलट के लिए जिम्मेवार माने जाने वाले कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र केंद्र- 'पेंटागन' को ही निशाना क्यों बनाया? क्या कारण है कि दूसरे मुल्कों में भी आतंकवादी हमलों का निशाना 'अमरीकी वाणिज्य दूतावास' ही बने है? क्या कारण है कि मुंबई में ताज होटल में हत्यारे आतंकवादी विदेशी पर्यटकों के पासपोर्ट देख देख कर अमरीकी और इसराइली नागरिकों को अपना निशाना बनाते हैं या नरीमन हाउस पर धावा बोलते हैं?
आतंकवाद के विरूध्द अमरीका की लड़ाई बेमानी है, चूंकि अमरीका का अब तक का इतिहास लगातार आतंकवादी जमातों को पालने पोसने और षडयंत्रों तथा हत्याओं के जरिए तख्तापलट का रहा है। शीत युध्द के दौरान समाजवादी देशों में अमरीका ने इस्लामिक फण्डामेंटलिस्ट्स को हथियार और धन मुहैया कराया ताकि वहां तख्ता पलट करके उसकी कठपुतली सरकारें बन सकें। अफगानी मुजाहिदीन और तालिबान भी अमरीका की ही देन हैं, जिन्हें हथियार और धन देकर उसने अफगानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन का तख्तापलट कराया था। स्वयं ओसामा बिन लादेन पहले अमरीकी एजेंट था और सद्दाम हुसैन ने भी अमरीका की शह पर तख्तापलट करके ही सत्ता हथियाई थी।
इसी प्रकार श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे को अमरीका समर्थित इजराइली खुफिया एजेंसी 'मोसाद' ने प्रशिक्षित किया है। क्या यह सच नहीं है कि कालांतर में भारत के खालिस्तानी आतंकवादियों को सी आई ए की मदद मिलती रही है और अमरीका में बैठकर ही खालिस्तान के नेता भारत में अपनी आतंकवादी कार्रवाइयां संचालित करते रहे हैं?
अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर बेगुनाह अफगान नागरिकों की हत्या करने के पीछे भी क्या अमरीका की मंशा सिर्फ तालिबान का तख्तापलट करना ही नहीं था? चूंकि अभी तक न तो ओसामा बिन लादेन पकड़ा गया है और न मारा गया है। मुल्ला उमर भी अमरीकी पकड़ से बाहर है, फिर अमरीका ने अफगानिस्तान में अपना अभियान रोक क्यों दिया है?
क्या इराक पर हमला करने के पीछे भी अमरीका की मंशा वहां  सिर्फ सद्दाम का तख्तापलट करना नहीं थी?वरना बुश साहब अभी तक उन जैविक और रासयनिक हथियारों को खोज क्यों नहीं पाए जिनका आरोप सद्दाम के ऊपर मढ़ा गया था। बल्कि ऐसे बम अमरीका के पास मौजूद हैं। कुछ दिन पहले रिपोर्ट्स आई थीं कि  'सुनामी' अमरीका के द्वारा समुद्र के भीतर एक आणविक विस्फोट करने के कारण आई थी। फिलिस्तीन के प्रकरण पर भी अमरीका का रवैया आतंकवादी रहा है। इसराइल के विरूध्द जब जब यूएनओ में प्रस्ताव आए तब तब अमरीका ने अपने वीटो का प्रयोग किया और स्वतंत्रता की कामना संजोए फिलिस्तीनियों के दमन में सहयोगी बना। क्या यह सच नहीं है कि सत्तर के दशक में भारत पर हमला करने के लिए अमरीकी नौसेना का सातवां बेड़ा करांची तक आ गया था?
जिस मुल्क ने लगातार तीस वर्ष तक वियतनाम पर नापाम बम बरसाकर धरती लहुलुहान की हो , हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए हों, इराक में पांच लाख बेगुनाह बच्चों का कत्ल किया हो, उसे यह अधिकार कैसे दिया जा सकता है कि वह तय करे कि कौन आतंकवादी है? और हमारे भद्रजन एक हत्यारे और आतंकवादी मुल्क से 'आतंक के विरुध्द लड़ाई का सबक सीखना चाहते हैं!
अगर अमरीका, फिडेल कास्त्रो, पुष्प कमल दहल 'प्रचण्ड' और अहमदीनेजाद को आतंकवादी घोषित कर दे, तो हम अमरीकी फरमान कैसे मान लें? अमरीकी फरमान मनमोहन सिंह मान सकते हैं, चूंकि वह अभी अभी बुश को 'आई लव यू' बोलकर आए हैं, अडवाणी जी मान सकते हैं, क्योंकि उनके गुरु ने अमरीका को धार्मिक योध्दा घोषित किया था। लेकिन सारी दुनिया को गौतम, महावीर  और  गांधी की अहिंसा व 'वसुधैव कुटुंबकम' का संदेश देने वाला ये भारतवर्ष कैसे किसी आतंकवादी और हत्यारे का हमराह बन जाए?
ग्यारह सितंबर से पहले भी 'विश्व व्यापार केंद्र' पर 1993 में आतंकवादी हमला हुआ था, उस समय भी अमरीका ने इस्लामी कट्टरवाद को दोषी ठहराया था।परंतु उसी समय स्वयं अमरीकी खुफिया तंत्र ने खुलासा किया था कि उस हमले के पीछे एक पूर्व अमरीकी सैन्य अधिकारी का हाथ था। उस समय भी एक बड़ा नरसंहार होते होते बच गया था। अफगानिस्तान और इराक में लंबा खूनी सफर तय करने के बाद भी आज तक अमरीका 11/9 के पीछे ओसामा या सद्दाम के हाथ होने का कोई प्रमाण नहीं दे पाया है।
आतंकवाद के विरुध्द युध्द संचालित करने का असल मकसद अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ उठ रहे विश्वव्यापी असंतोष को दबाना है। सारी दुनिया में और खासतौर पर विकासशील देशों में भूमण्डलीकरण (भारत में जिसके पैरोकार मनमोहन और अडवाणी दोनों हैं) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट खसोट के खिलाफ जनमत तैयार हो रहा है। अगर यही स्थिति रही तो अमरीकी कंपनियों को दुनिया में कारोबार करना दुश्वार हो जाएगा। इसीलिए अमरीका आतंक के खिलाफ लड़ाई में भारत के साथ खड़ा होना दिखाना चाहता है, चूंकि डूबती अमरीकी अर्थव्यवस्था क लिए भारत एक बड़ा बाजार है।
जो लोग अमरीका के नक्शे कदम पर चलने की सलाह दे रहे हैं, क्या वे यह नहीं देख रहे हैं कि अमरीका की इन्हीं युध्दोन्मादी और सामा्रज्यवादी नीतियों और इराक में बुरी तरह घिर जाने के चलते ही उसका दिवाला निकल गया है। दुनिया का हेकड़ दादा आज विश्व का सबसे बड़ा कर्जदार मुल्क है।और जो भारत को अमरीका बनने की सलाह दे रहे हैं उन्हें यह भी तो बताना चाहिए कि अमरीका बनने पर मुंतजिर अल जैदी का जूता भी मुफ्त में मिलता है, इसे लेने को कौन सा हुक्मरां रजामंद है?
फैज अहमद 'फैज' की एक लंबी नज्म है, जिसका सारांश है कि जंग तो खुद एक मसला है, जंग क्या मसलों का हल होगी? इसलिए ए शरीफ इंसानों इंसानियत की बेहतरी के लिए जंग टलती रहे तो बेहतर है।

--अमलेन्दु उपाध्याय ( लेखक राजनीतिक समीक्षक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)



Comments to this Article
लेख बहुत अच्छा है परन्तु शीर्षक व अंत में लिखे गए शेर में फैज़ अहमद
फैज़ का नाम देना लेखक की अज्ञानता को दर्शाता है .
पूरी नज़्म लेखक के ज्ञान वर्धन के लिए प्रस्तुत है.
ये नज़्म फैज़ की नहीं बल्कि हमारे देश के ही मशहूर शाएर
साहिर लुधयान्वी की है

खून अपना हो या पराया हो
नस्ल ए आदम का खून है आख़िर
जंग मशरिक में हो या मग़रिब में
अमन ए आलम का खून है आख़िर
टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़तहे का जश्न हो या हार का सोग
जिंदिगी मैयतों पे रोती है
जंग तो ख़ुद ही एक मसला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
खून ओर आग आज बरसेगी
भूख ओर एहतियाज कल देगी
इसलिए ए शरीफ इंसानों
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप ओर हम सभी के आँगन में
शम्मा जलती रहे तो बेहतर है

साहिर लुधयान्वी

प्रस्तुति समीर , sameer (2008-12-23 20:35:31)
भाई समीर जी का बहुत बहुत शुक्रिया की उन्होंने अपनी महानता और मेरी अज्ञानता पर ध्यान आकृष्ट किया. समीर जी वर्तनी और शब्दों के फेर पड़कर दिग्भ्रमित हो गए हैं और भाषा के मर्म को नहीं समझ पा रहे. वैसे समीर जी अति महान हैं जिन्होंने फैज़ को विदेशी शायर होने का फतवा दे दिया और नज़्म पूरी कहकर अधूरी लिखी. यह समीर जी की कुंठा है की वे लेख के मूल तत्वों पर चर्चा नहीं कर रहे है और एक नज़्म के लेखक पर बहस कर रहे हैं. वैसे समीर जी यह भी ज्ञानवर्धन करें की साहिर ने किस किताब में यह नज़्म लिखी है? समीर जी बड़ी कृपा होगी अगर फैज़ पर विदेशी होने का ठप्पा न लगाये चूंकि फैज़ हिन्दुस्तान के दिल में बसते हैं
अमलेन्दु उपाध्याय ., amalendu upadhyaya (2008-12-24 13:15:52)
अमलेंदु जी लगता है आप को अज्ञानता शब्द का प्रयोग करना बुरा लग गया. आप तो बहुत महान लेखक हैं और मैं आप का फैन हूँ ज्ञान के अभाव को ही तो अज्ञानता कहते हैं यदि आप को ज्ञान होता की अमुक रचना साहिर की है तो आप फैज़ का नाम ही क्यों लिखते . मुझ जैसे साधारण पाठक को आप महान कह रहे हैं जो की आप की नाराज़गी को दर्शाता है. आप मुझे क्षमा करें. फैज़ साहब तो मेरी जानकारी के अनुसार पाकिस्तान चले गए थे जबकि साहिर साहब हमारे देश के कवि थे हम तो फैज़ को भारतीय कवि नहीं कह सकते आप चाहें तो कहें हमें न तो कोई आपत्ति है न ही हम इस विवाद में पर कर आप को फिर से नाराज़ करना चाहते हैं. आप से एक बार पुनः क्षमा चाहता हूँ समीर , sameer (2008-12-29 22:13:14)
मित्र समीर जी की नाराज़गी मिली. यह सही है की फैज़ पकिस्तान चले गए थे लेकिन बाद में उन्होंने भारत वापस आने के लिए इच्छा भी जताई थी. कुछ वैसी ही मजबूरी फैज़ के सामने थी जैसी सीमान्त गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ थी. समीर जी नाराज़ होना मेरी फितरत में नहीं है और ज्ञान की सीमा वहां से शुरू होती है जहाँ से हम समझते है की हम सब जानते हैं. सब कुछ ज्ञान होने का दावा तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भी नहीं किया था तो मैं किस खेत की मूली हूँ? अच्छी बात है की एक पाठक से ज्ञान प्राप्त हुआ.
शुभकामनाओं के साथ
अमलेन्दु उपाध्याय , amalendu upadhyaya (2008-12-30 13:15:49)
good.i will say very good., manoj (2009-01-05 13:27:35)

 Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 




Send e-Cards to your Love once and near & dear

Latest Articles
» 

» 

» 

» 

» 


Articles By Writers Most Read Articles
» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 

» 


Jain Calendar Launched at Terapanth Bhawan, Gangasahar
More Photo

Dos Base Payroll Software

Insight : 
Home | Business | Entertainment | Celebrity | Sports | Education | Health | Sci-Tech | National | World | Article | Photo Gallery | Video Gallery | E-card | Forums | Camel Festival | Vartmaan Sahitya | Nagar Ek - Nazaare Anek
Company : 
About Us | Feedback | Advertise with us | Terms of use | Privacy Policy | Archives | Site Map | Can't See Hindi? | News Ticker | RSS
Our Network : 
RajB2B.com
UniqueIdea.net
PelagianDictionary.com
PelagianSoftwares.com
HindiNotes.com
Follow us on : 
         
Copyright @ 2010 Natraj Infosys All rights reserved