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22 November 2008
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11
Aug
कहां से मिलती है आत्मघाती हमलावरों को प्रेरणा

तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

पाकिस्तान की राजनीति से परवेज मुशर्रफ की बिदाई क्या हुई कि वहां आत्मघाती हमलों की झडी सी लग गई है। पिछले दिनों मात्र तीन दिनों के भीतर तीन बडे आत्मघाती हमले पाकिस्तान में अंजाम दिए गए। मुशर्रफ की बिदाई के अगले ही दिन 19 अगस्त को पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के डेरा इस्माईल खां में बडे ही सुनियोजित ढंग से एक बडा आत्मघाती हमला किया गया। वहां पहले अज्ञात मोटर साईकिल सवारों द्वारा शिया समुदाय के एक व्यक्ति को गोली मारी गई। जब उस घायल व्यक्ति को स्थानीय जिला सिविल अस्पताल में ले जाया गया तथा उसके पीछे भारी भीड व पुलिसकर्मी अस्पताल पहुंचे ठीक उसी समय उसी भीड में शामिल होकर एक आत्मघाती हमलावर ने स्वयं को भारी विस्फोट से उडा दिया। परिणामस्वरूप 25 व्यक्ति घटना स्थल पर ही मारे गए। मृतकों में अधिकांश लोग शिया समुदाय से संबंधित थे जबकि कई पुलिस वाले भी इस हमले में मारे गए। डेरा इस्माईल खां में इससे पूर्व भी कई आत्मघाती हमले हो चुके हैं।
दूसरा बडा ताजातरीन आत्मघाती हमला 21 अगस्त को इस्मालाबाद से मात्र से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हथियार बनाने वाली एक सरकारी फैक्ट्री में हुआ। यहां हमलावरों ने 2 अलग-अलग विस्फोट हथियार फैक्ट्री के दो अलग-अलग मुख्य द्वार पर उस समय किए जबकि बडी संख्या में फैक्ट्री के कर्मचारी अपना काम समाप्त करने के बाद मुख्य द्वार से बाहर निकल रहे थे। मात्र 30 सेकेंड के अंतराल में हुए इन हमलों में 75 लोग तो मौके पर ही मारे गए जबकि 100 से अधिक लोगों के गम्भीर रूप से घायल होने का भी समाचार है। इन आत्मघाती हमलों की जिम्मेदारी पाकिस्तान में ही रह रहे तालिबान प्रवक्ता मौलवी उमर द्वारा स्वीकार की गई है। इस तालिबानी प्रवक्ता का कहना है कि पाक अफगान सीमा के कबाईली क्षेत्रों में पाक सेना द्वारा की जा रही सैन्य कार्रवाई के विरोध में यह हमले किए गए हैं। तालिबानी प्रवक्ता ने कहा कि यह आत्मघाती हमला बाजौर में हुई बेगुनाह महिलाओं व मासूम बच्चों की मौत का बदला है। ज्ञातव्य है कि पाक सेना ने नाटो सेनाओं के साथ मिलकर पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के निकट के कबाईली क्षेत्र विशेषकर बाजौर व उसके आसपास के क्षेत्रों में अगस्त के दूसरे सप्ताह में 4 दिनों के भीतर सौ से अधिक तालिबानी चरमपंथी मार गिराए थे। तालिबान विरोधी इस सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तानी सेना के 9 सैनिक भी मारे गए थे।
प्रश्न यह है कि आत्मघाती विस्फोट करने की प्रेरणा इन हमलावरों अथवा इनके आकाओं को कहां से प्राप्त होती है। यह किसी रूढीवादी धार्मिक शिक्षा का परिणाम है अथवा किसी जुनून की पराकाष्ठा? आखिर इतना बडा वहशीपन किसी आत्मघाती हमलावर के भीतर कैसे अपनी जगह बना पाता है? यदि हम आत्मघाती हमलावरों के इतिहास पर नजर डालें तो सर्वप्रथम 1980 में आत्मघाती दस्ते गठित किए जाने का सिलसिला शुरु हुआ। इसका सबसे बडा सफल परीक्षण 1983 में उस समय किया गया जबकि बारूद से भरे एक ट्रक को एक आत्मघाती हमलावर ने बेरुत में एक बडे एवं अतिसुरक्षित भवन से टकरा दिया। इस आत्मघाती ट्रक विस्फोट में 300 लोग मारे गए जबकि सैकडों लोग घायल हो गए। यह हमला अमेरिका व ब्रिटिश सेनाओं को चेतावनी देने हेतु किया गया था। दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में कहीं विद्रोह करने वाले तो कहीं कथित रूप से स्वतंत्रता की लडाई लडने वाले हथियारबंद संगठनों को अपने भारी भरकम दुश्मन से लडने का यह उपाय पसंद  आया। उसके पश्चात आत्मघाती हमलों की यह रणनीति लंका के तमिल टाईगर्स व फिलिस्तीन के हमास जैसे हथियारबंद संगठनों द्वारा अपनाई गई। तत्पश्चात जैसे-जैसे इन आत्मघाती हमलों के सकारात्मक परिणाम हमलावरों तथा विद्रोहियों को नजर आते गए वैसे-वैसे ऐसे आत्मघाती हमलों में इजाफा होता गया।
आत्मघाती हमलों से इस समय विश्व के लगभग 30 देश प्रभावित हैं अथवा इन देशों पर आत्मघाती हमलों जैसे खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। मुख्य रूप से इजराईल, फिलिस्तीन, इराक, अफगानिस्तान, श्रीलंका व पाकिस्तान जैसे देशों में इन दिनों आत्मघाती हमलावर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं तथा इन्हीं देशों में इन आत्मघाती हमलावरों को आत्मघाती हमला करने हेतु मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है। भीडभाड वाले आसान लक्ष्य को निशाना बनाने के लिए चलता-फिरता एक अकेला आत्मघाती हमलावर अपना काम अंजाम दे सकता है। जबकि अतिसुरक्षित एवं चाक चौबंद चौकसी से भरपूर तथा बैरीकेड लगे क्षेत्रों को उडाने के लिए विस्फोट से भरी कार अथवा ट्रक को आत्मघाती हमलावरों द्वारा स्वयं चालक के रूप में विस्फोट स्थल से टकरा दिया जाता है। बहुत कम ही परिस्थितियों में ऐसे आत्मघाती हमलों को रोक पाना सम्भव हो पाता है। आत्मघाती हमलों के इस भयावह व दर्दनाक इतिहास में अब तक जहां हजारों जानें जा चुकी हैं, वहीं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा श्रीलंका के राष्ट्रपति राणासिंघे प्रेमदास जैसे महान नेता भी ऐसे ही आत्मघाती हमलों की भेंट चढ चुके हैं।
आत्मघाती हमलावरों की मनोस्थिति के विषय में तथा इनके इस हद तक के जुनून के बारे में विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। अधिकांश लोगों का यह मानना है कि अमेरिकी व उसकी सहयोगी सेनाओं द्वारा विभिन्न देशों में की जा रही ज्याद्ती के परिणामस्वरूप आत्मघाती हमलों का यह सिलसिला शुरु हुआ जोकि आज तक जारी है। बेरुत जैसे 1983 के सफल आत्मघाती मिशन के बाद इस रणनीति को अन्य विद्रोहियों द्वारा अपनाया जाने लगा। जबकि कुछ लोगों का यह मानना है कि इस्लाम धर्म के इतिहास में पाई जाने वाली शहादत की तमाम घटनाएं इन आत्मघाती हमलावरों को प्रेरणा देती हैं। परन्तु तमिल टाईगर्स जैसे गैर इस्लामी आत्मघाती हमलावरों को देखने के बाद यह दलील सटीक नहीं बैठ पाती। हां यह जरूर माना जा सकता है कि अमेरिका व उसके सहयोगी देशों की सेनाओं के विरोधस्वरूप ऐसे (आत्मघाती) हमले न सिर्फ शुरु हुए थे बल्कि इसी कारण यह हमले बढते भी जा रहे हैं। इराक में आज जितने भी आत्मघाती हमले सुनाई दे रहे हैं उनमें अधिकांश हमलों के पीछे की मंशा यही है कि किसी प्रकार अमेरिका व उसकी सहयोगी सेनाएं इराक से बाहर निकल जाएं तथा इराकियों को उनके अपने देश में आजादी से जीने दें।
रहा सवाल इस्लामी प्रेरणा का तो इस्लाम में कहीं भी ऐसा आत्मघाती हमला न तो किसी ने किया है न ऐसा हमला करने की किसी धर्मगुरु ने प्रेरणा दी है और न ही किसी इस्लामी धर्मशास्त्र में ऐसे वीभत्स एवं अमानवीय हमलों का उल्लेख मिलता है। सत्य के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देने तथा असत्य के आगे अपने घुटने कभी न टेकने जैसी प्रेरणा अवश्य इस्लाम देता है। बेगुनाह और निहत्थे लोगों को निशाना बनाए जाने जैसी प्रवृत्ति पूरी तरह से गैर इस्लामी ही नहीं बल्कि इस्लाम विरोधी भी है। आज यदि जेहाद, जन्नत अथवा इस्लाम के नाम पर चंद गुमराह आतंकवादी संगठनों द्वारा गरीब बच्चों को व युवकों को आत्मघाती हमला करने हेतु तैयार किया जाता है तो यह सवाब (पुण्य) नहीं बल्कि गुनाह-ए-कबीरा (महापाप) है। इस्लाम तो अप्राकृतिक मौत को ही पसन्द नहीं करता फिर आखिर आत्मघाती हमलावर जन्नती या स्वर्ग का दावेदार कैसे और क्योंकर हो सकता है। ऐसा हमलावर अप्राकृति रूप में अपनी जान देने जैसा पाप एवं अपराध तो करता ही है, साथ-साथ दूसरे बेगुनाहों की हत्या का भी वही शख्स दोषी होता है। और उससे बडे दोषी हैं वे कट्टरपंथी और रूढीवादी तथाकथित धर्मगुरु जो ऐसे हमलावरों को मौत के बदले जन्नत के सौदे का सब्जबाग दिखाते हैं।


तनवीर जाफरी - tanveerjafri1@gmail.com




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