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भुट्टो का असली वारिस कौन?

06 Feb 2008      Add comment     Mail     Print     Write to Editor      Other Articles By This Writer

तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

पाकिस्तानी में उथल-पुथल व अस्थिरता का जो दौर इन दिनों देखा जा रहा है, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। हालांकि पाकिस्तान में आम चुनाव होने जा रहे हैं परन्तु इसके बावजूद इन चुनावों पर भी अराजकता, संदेह, पक्षपात तथा अविश्वास के बादल मंडरा रहे हैं। वहां कोई राजनैतिक संगठन चुनाव का बहिष्कार कर रहा है तो कोई इस चुनाव को मात्र एक मजाक बता रहा है। कोई इन चुनावों में विदेशी पर्यवेक्षक नियुक्त करने की मांग कर रहा है तो कुछ लोग बेनजीर भुट्टो की हत्या से उपजे सहानुभूतिपूर्ण वातावरण में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सत्ता में वापसी की आस लगाए बैठे हैं। चुनाव के दौरान भारी अराजकता फैलने तथा हिंसक वारदातें होने की भी संभावना बनी हुई है। लेकिन इन सभी परिस्थितियों के बीच पाकिस्तान की जनता अभी तक इसी पसोपेश में पडी हुई है कि बेनजीर की हत्या के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो के असली वारिस के रूप में आखिर किसे स्वीकार किया जाए।
  27 दिसम्बर 2007 को पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की प्रमुख, 54 वर्षीय बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रावलपिंडी शहर में उस समय हत्या कर दी गई थी जबकि वे एक जनसभा को सम्बोधित कर सभास्थल से बाहर निकल रही थीं। इस हत्या के तत्काल बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने एक आपात बैठक बुलाकर पी पी पी के नए अध्यक्ष के रूप में बेनजीर भुट्टो के पुत्र 19 वर्षीय बिलावल भुट्टो जरदारी का नाम घोषित कर दिया था। जबकि बिलावल के पिता आसिफ अली जरदारी को पार्टी का कार्यवाहक अध्यक्ष घोषित किया गया था। बेनजीर की हत्या के तुरन्त बाद पार्टी द्वारा लिए गए इस फैसले पर भले ही पाकिस्तान की अवाम ने तत्काल कोई प्रतिक्रिया देना मुनासिब नहीं समझा परन्तु अब जबकि इस घटना को एक माह से अधिक का समय बीत गया है, पाकिस्तानी अवाम में यह चर्चा आम होने लगी है कि जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा गठित पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का असली वारिस आखिर कौन होगा? दामाद आसिफ अली जरदारी, नाती बिलावन भुट्टो जरदारी या फिर कोई और?
 यदि हम जुल्फिकार अली भुट्टो परिवार पर नजर डालें तो हमें बेनजीर भुट्टो की राजनैतिक सक्रियता से भी पहले जुल्फिकार अली भुट्टो के पुत्र मुर्तुजा भुट्टो का नाम नजर आता है। मुर्तुजा भुट्टो की हत्या 20 सितम्बर 1996 को पाकिस्तान पुलिस द्वारा कराची शहर में कर दी गई थी। मुर्तुजा के 6 साथी भी इस गोलीबारी में मारे गए थे। इस घटना के बाद तो मुर्तुजा भुट्टो का परिवार राजनैतिक सक्रियता से बिल्कुल दूर हो गया था। परन्तु उसी दौरान मुर्तुजा भुट्टो की एक प्रतिभाशाली बेटी फातिमा भुट्टो कोलम्बिया विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त कर रही थी। 29 मई 1982 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में पैदा हुई फातिमा भुट्टो इस समय एक स्थापित कवि एवं लेखिका बन चुकी हैं। उन्होंने अपने पहले काव्य संग्रह ‘व्हिस्पर ऑफ द डेजर्ट’ की सफलता के बाद प्रसिद्घि के शिखर को छूना शुरु कर दिया था। उनका यह प्रथम काव्य संग्रह जिस समय प्रकाशित हुआ तब फातिमा की आयु मात्र 15 वर्ष की थी। इस समय फातिमा भुट्टो कई समाचार पत्रों में एक स्तम्भकार के रूप में लेखन कर रही हैं।
  दूसरी ओर बेशक बेनजीर की हत्या के पश्चात पाकिस्तानी जनता की सहानुभूति बेगम भुट्टो के पुत्र बिलावल के साथ जुडी हुई है परन्तु इस कडवे सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तानी अवाम के बीच बेनजीर भुट्टो जितनी अधिक लोकप्रिय एवं स्वीकार्य थीं, उनके पति आसिफ अली जरदारी को पाक जनता उतना ही नापसन्द भी करती है। जरदारी को नापसन्द किए जाने का कारण यह है कि जरदारी पर भ्रष्टाचार के कई मुकद्दमे चल चुके हैं। जिनमें से कुछ मुकद्दमों में तो उनपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप  सिद्घ भी हो चुके हैं। और भ्रष्टाचार के इस अपराध में जरदारी साहब को पाक अदालतों द्वारा सजा भी सुनाई जा चुकी है तथा वे कई वर्षों तक जेल में रहकर अपने इन अपराधों की सजा भी काट चुके हैं। आसिफ जरदारी की रिश्वत व भ्रष्टाचार में Fatima Bhuttoसंलिप्तता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी अवाम में जरदारी को ‘मिस्टर टेन परसेंट’ के नाम से भी मकबूलियत हासिल है। ऐसे में पाकिस्तान की साफ सुथरी सोच रखने वाली अवाम का यह चिंतन करना लाजमी है कि यदि बिलावल भुट्टो जरदारी भविष्य में भुट्टो खानदान के नाम पर देश की राजनीति की बागडोर संभालते हैं तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी बिलावल के लिए उनकी राह आसान करती है तो आखिर ऐसे में बिलावल अपने उद्योगपति पिता की दागदार छवि से स्वयं को किस तरह से दूर रख सकेंगे। इस बात की भी आखिर क्या गारंटी है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वर्तमान संगठनात्मक स्वरूप में सत्ता में आ जाने के बाद आसिफ अली जरदारी पुनः भ्रष्टाचार में संलिप्त नहीं होंगे।
  अनेक संकटों से जूझ रहे पाकिस्तान का यह कितना दुर्भाग्य है कि वहां सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति कभी तानाशाही के नशे में इतना चूर हो जाता है कि अपने आप को सत्ता में बनाए रखने के लिए वह सब कुछ करने को तैयार रहता है तो कभी लोकतांत्रिक व्यवस्था में चाहे वे पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ हों अथवा पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पति आसिफ अली जरदारी। इन सभी शीर्ष नेताओं पर भ्रष्टाचार के धब्बे लगे दिखाई देते हैं। इन्हीं हालात ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की समर्थक जनता को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि स्वर्गीय जुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा गठित इस राजनैतिक दल की कमान आखिर किसे सौंपी जाए। उस उत्तराधिकारी को जिसपर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्घ हो चुके हों अथवा उसे जोकि वास्तविक उत्तराधिकारी होने के साथ-साथ एक साफ सुथरे चरित्र का भी स्वामी हो।
  बेनजीर भुट्टो को पूरब की बेटी कहा जाता था। अब बेनजीर की भतीजी तथा मुर्तुजा भुट्टो की बेटी अर्थात् जुल्फिकार अली भुट्टो की 25 वर्षीय सगी पोती फातिमा भुट्टो को पूरब की दूसरी बेटी के रूप में देखा जा रहा है। फातिमा स्वयं राजनीति में आएंगी या नहीं इसका फैसला तो उन्होंने स्वयं करना है परन्तु इन अटकलों के विषय में उनके द्वारा जो प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं उन्हें सुनकर ही फातिमा की ऊंची सोच, काबिलियत व पारदर्शिता का अन्दाजा लगाया जा सकता है। फातिमा का कहना है कि वे सक्रिय राजनीति में आने के बजाए अपने लेखन एवं स्तम्भ के माध्यम से ही जनता व राजनीति से जुडी रहना चाहती हैं। बावजूद इसके कि वह पाक अवाम से जुडे सामाजिक कार्यों में भी दिलचस्पी रखती हैं। राजनीति में अपनी सक्रियता के विषय पर उनका साफ मानना है कि खानदानी राजनीतिज्ञों के परिवार के सदस्यों का राजनीति में सक्रिय होना कोई जरूरी नहीं है। गोया उनका सीधा संदेश यही है जुल्फिकार अली भुट्टो की सगी पोती होने के बावजूद उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं हैं कि उन्हें भुट्टो के राजनैतिक वारिस के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेने हेतु आमादा किया जाए।
  इसमें काई संदेह नहीं कि आज के नए नवेले युवा राजनीतिज्ञ अपने माता पिता अथवा राजनैतिक रिश्तेदारों के कंधों पर सवार होकर राजनीति की वैतरणी को पार करना चाहते हैं। भारत व पाकिस्तान सहित दुनिया के कई देशों में ऐसा देखा भी जा रहा है। परन्तु इसके बावजूद यदि फातिमा भुट्टो जैसी तेज तर्रार एवं उच्च विचार रखने वाली युवती इतनी बडी खानदानी विरासत को नजरअंदाज करें तो निश्चित रूप से यह उसके महान व्यक्तित्व एवं बुलंद सोच की ही पहचान है।
  बेशक पकिस्तान में हो रहे चुनावों में फातिमा भुट्टो की फिलहाल कोई सक्रिय भूमिका न हो परन्तु भुट्टो परिवार की यह असली वारिस निकट भविष्य में भी सक्रिय राजनीति से दूर रहेगी इसकी संभावना कम ही नजर आती है। केवल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ही नहीं बल्कि भुट्टो परिवार व पाक अवाम के लिए भी बेहतर यही होगा कि उन्हें फातिमा भुट्टो जैसी साफ सुथरी छवि का ईमानदार एवं दूरदृष्टि रखने वाला चरित्रवान नेता मिले। ताकि भ्रष्टाचार के आरोपों को गत् दो दशकों से झेलती आ रही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को स्वच्छ छवि का नेतृत्व तो मिले ही साथ-साथ भुट्टो परिवार को भी तीन दशकों के बाद उसका सही राजनैतिक वारिस मिल सके।   तनवीर जाफरी


तनवीर जाफरी - 
tanveerjafri1@gmail.com


Comments to this Article
पाकिस्तान के अधर मे झूलते हुए राजनितिक फैसलों मे फातिमा भुट्टो एक सही राह है और अगर फातिमा सामजिक कार्यो मे दिलचस्पी रखती है तो फिर अपनी काबिलियत का सही इस्तेमाल यही होगा कि उन्हें इस दलदल मे एक बार कदम रखने ही होगे क्योकि अगर कमल कीचड मे जाने से इनकार कर देगा तो उसकी सुन्दरता का पता कैसे चलेगा अक्सर लोगो मे काबिलीयत होते हुए भी वे सुखी जिन्दगी के लिए अपने गुणों को अपने अन्दर ही लेकर चले जाते है देश के सैकडो रत्न इसी तरह जमीन मे पड़े रहते है क्यों कि कोई भी इस दलदल मे कदम रखने से डरता है पर कुछ इंसान सिर्फ अपने लिए नही अपने देश के भी लिए जीना चाहते है पर उन्हें सही राह नही मिलती
फातिमा भुट्टो एक अच्छी लेखिका है और वे जनता और राजनीति मे लेखन के द्वारा ही जुडी रहना चाहती है ये भी सच है कि जो काम तलवार नही कर सकती वो कलम कर सकती है पर कलम के साथ अगर अधिकार हो तो देश और देश के लोगो को बदलना आसान हो जाता है इसलिए फातिमा भुट्टो को राजनीति मे आना ही चाहिए क्योकि देश को अगर सुधारना है तो उसे अधिकार इस्तेमाल करने होंगे जो उसे कोई ठोस सता ही दिला सकती है इसलिए केवल अपनी जिन्दगी की खुशिया न देख कर आम जनता को देखते हुए उन्हें राजनीति के दलदल मे भी अपने कदम रखने चाहिए , Rani (2008-02-08 20:33:33)
jan, jan (2008-08-16 21:31:56)

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