Monday, 27 September 2021

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एक अनशन जनता के लिए


Shyam Narayan Ranga

 

अभी हाल ही में कुछ दिन पहले अण्णा हजारे ने अनशन किया और मान गए और अब बाबा रामदेव अनशन कर रहे हैं। ये सब अनशन और आंदोलन और धरना प्रदर्शन जो हमारे देश में होते हैं वे सिस्टम के खिलाफ होते हैं और सब लोग मिलकर सारा दोष सरकार व सरकार चलाने वाले नेताओं पर मढ देते हैं और उनके खिलाफ इस प्रकार के प्रदर्शन कर अपना विरोध प्रदर्शित करते हैं। इन सब प्रदर्शनों को देखकर ऐसा लगता है कि सारा का सारा दोष इन नेताओं का ही है और एक मात्र राजनीति करने वाले ये लोग ही इस देश का बंटाधार कर रहे हैं। मैं इन सब के बीच एक बात कहना चाहंगा कि हम लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में जीते हैं और इस सिस्टम का निर्माण हमारी जनता ने ही किया है। जनता ही इस सारे सिस्टम और इस सारे नेताओं के मूल में है। लोकतंत्र में जनता जनार्दन है और भारत के भाग्य की विधाता भी जनता ही है। 

क्या वास्तव में सारे नेता ही इस सिस्टम और नकारापन के कारण है। ऐसा नहीं है वास्तव में हमारे देश की जनता भी इस सब दोषों के लिए बराबर की भागीदार है और सबसे बडा दोष जनता का ही है। लोकतंत्र में आखिरी निर्धारक जनता है सो जनता की ही जिम्मेदारी है कि वह जिस सिस्टम का निर्माण कर रही है उसे भली भाँति बनाए और सारे सिस्टम के बारे में सोचकर अपने वोट का प्रयोग करें। 

वास्तव में जनता ने ही इस सारे सिस्टम को खराब किया है। देश में काम करने वाले करोडो लोग चाहे वह आईएएस हो, क्लर्क हो, चपरासी हो, ठेकेदार हो, दुकानदार हो, व्यापारी हो सब के सब भ्रष्ट ह। इस देश की जनता ने खुद ने भ्रष्टाचार को पनाह दी है। देश का आईएएस भ्रष्टाचार म लिप्त हैं, क्लर्क पैसे खाता है, डॉक्टर बिना फिस देखता नहीं, इ्रंजीनियर घूस खाकर काम करता है, ठेकेदार मिलावट करने से चूकता नहीं, व्यापारी व उद्योगपति जमाखोरी कालाबाजारी में लगे हुए हैं, धर्म के नाम पर धंधा चल रहा है, साधु संयासियों के आश्रम ऐसो आराम और अय्यासी के अड्उे बने हुए हैं। कहने का मतलब है कि चारों ओर लूट मची है तो ऐसी स्थिति में सिर्फ नेताओं और राजनीति करने वालों पर  दोष मंढ कर मुक्त नहीं हुआ जा सकता। 

क्या इस देश के आईएएस, क्लर्क, चपरासी, डॉक्टर, इंजीनियर, ठेकेदार का दायित्व नहीं है कि वो ईमानदारी से काम करें वो अपना सब कुछ देश के हित में लगाए। जब ये सब के सब वर्ग के लोग भ्रष्टाचार में लिप्त है तो सिर्फ राज करने वाले लोगों पर दोष देना कितना उचित है। हमारी मानसिकता में परिवर्तन लाना बहत जरूरी है। हम सरकार की चीज को दुरूपयोग के लिए ही समझते हैं, सरकारी सम्पत्ति को तोडना, उसका उचित उपयोग न करना हम अपना दायित्व समझते हैं। आम आदमी खुद अपने पर नजर डाले कि वो टैक्स की चोरी कितनी करता है, दिन भर में कितनी दिवारों पर पान कि पीक थूकता है, यत्र तत्र कितना कूडा फैलाता है, ट्रेफिक नियमों को दिन भर में कितनी बार तोडता है, कितनी सरकारी सम्पत्ति का दुरूप्योग करता है, अपने काम पर समय पर जाता है क्या और अपने दफतर में कितनी देर बातें करता है, कितनी देर काम करता है, काम की चोरी कितनी करता है। क्या इस देश के आम नागरिक की जिम्मेदारी नहीं है कि वह खुद अपने पर ध्यान दें और अपने में सुधार के प्रयास करें। 

हम दूसरे विकसित देशों की बडाई करते हैं लेकिन एक बार सोचे कि हम अमेरिका या जर्मनी या कुआलालाम्पुर कहीं पर भी विदेश में जाते ह तो क्या एयरपोर्ट पर थूकते हैं, क्या सार्वजनिक जगहों को शौचालय बनाते हैं, क्या हम वहाँ पर ट्रेफिक नियमों का उल्लघंन करते हैं, क्या हम वहाँ पर बिना टिकट यात्रा करने का प्रयास करते हैं नहंी ना तो फिर दिल्ली, मुम्बई में घूसते ही हमें ऐसा क्या हो जाता है कि इन सब बातों को हम धडल्ले से करते हैं वहाँ कौनसा नेता आकर कहता है कि आप खुले आम थूकों, टिकट बिना यात्रा करों आदि आदि। एक नजर अपने पर डाले कि क्या धरना व प्रदर्शन जो कर रहे हैं वो कहीं अपने खिलाफ ही करें तो कितना अच्छा हो। 

हमारे अनशन करने वाले लोग राजघाट जाकर अपने इस शुभ कार्यों की शुरूआत करते हैं ताकि आम जन में ये संदेश जाए कि गाँधी जी के बताए सिद्धांतों व आदर्शों पर चलने का प्रयास किया जा रहा है। पर याद करो कि महात्मा गाँधी ने एक अनशन जनता के खिलाफ भी किया था। जब इस देश का विभाजन हुआ और चारों तरफ मारकाट मची थी तो इस युग पुरूष ने दिल्ली में भूख हडताल शुरू ही आम आदमी के खिलाफ और कहा कि जब तक आम आदमी शांति से नहीं रहेगा वे अनशन नहीं तोडेगे। आम आदमी ने उस राष्ट्रपिता की बात को सुना और माना। मारकाट बंद हुई तो क्या आज के इन बाबाओं को या समाज सेवकों को या किसी की भी ये जिम्मेदारी नह  बनती कि वे आम जनता को सुधाने के लिए अनशन करें और जनता को बनाए कि वह कितना गलत कर रही है। 

सिस्टम खराब है, राजनेता ईमानदार नहीं रहे पर क्या जनता के आदर्श उच्च रहे हैं नहीं ना तो इस सिस्टम को जन्म देने वाली जनता ही पवित्र न होगी तो इससे पैदा होने वाला सिस्टम कैसे पवित्र होगा। हमें चाहिए कि हम अपने नैतिक चरित्र व राष्ट्रीय चरित्र को उच्च बनाए और महात्मा गाँधी के कहे उन शब्दों पर गौर करें कि किसी भी काम को करने से पहले यह सोचें कि आफ द्वारा किए गए इस काम से इस देश के सबसे गरीब आदमी को क्या फायदा होगा अगर कोई उस अंतिम आदमी को कोई फायदा हो तो ही वह काम करें अन्यथा नहीं। 

मेरी राय है या मांग है इन नेताओं से संस्थाओं से धर्म गुरूओं से कि वे एक विशाल अनशन करें जनता के खिलाफ, जनता की आदतों के खिलाफ, ताकि आम जन को लगे कि वो भी गलत है और इस सारी व्यवस्था में बराबर का भागीदार है। 
 

 



श्याम नारायण रंगा ’अभिमन्यु‘
पुष्करणा स्टेडियम के पास, नत्थूसर गेट के बाहर, बीकानेर