Thursday, 13 May 2021

KhabarExpress.com : Local To Global News

क्या यही है जिन्नाह के सपनों का पाकिस्तान?


तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी)

पाकिस्तान के महानगर कराची में गत् 18 अक्तूबर की रात्रि में आतंक का वह इतिहास लिखा गया जिससे केवल पाकिस्तान के लोग ही नहीं बल्कि पूरी मानवता दहल उठी। पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री तथा उदारवादी नेता बेनजीर भुट्टो अपने स्वयंभू देश निर्वासन के 8 वर्षों बाद 18 अक्तूबर को दोपहर बाद जब कराची पहुंचीं तो लाखों लोग उनके स्वागत के लिए बेताब नजर आए। हालांकि 1986 में भी जब कई वर्षों बाद बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान वापस लौटी थीं तो उस सयम भी लाहौर हवाई अड्डे पर उनका ऐतिहासिक स्वागत किया गया था। परन्तु 18 अक्तूबर को हुए बेनजीर के स्वागत ने तो गोया पाकिस्तान के सभी नेताओं के स्वागत के सारे कीर्तिमान तोड डाले।
जाहिर है चरमपंथियों व रूढीवादियों को यह बात अच्छी नहीं लगी कि धार्मिक कट्टरपंथ की ओर बढते जा रहे पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो जैसी उदारवादी सोच रखने वाली महिला पुनः पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय हो तथा चरमपंथी इस्लामिक विचारधारा से तंग आ चुके बहुसंख्य उदारवादी मुसलमानों को नेतृत्व प्रदान करे। अपनी इसी संकुचित सोच के परिणामस्वरूप इन तथाकथित स्वयंभू इस्लामी ठेकेदारों ने बेनजीर भुट्टो के काफिले पर ऐसा भयानक हमला करवाया जिसने पाकिस्तान में हुए आतंकवादी हमलों के पिछले सभी रिकॉर्ड तोड डाले। एक ग्रेनेड के तथा दूसरे एक आत्मघाती हमले के परिणामस्वरूप लगभग 140 लोग मारे गए तथा करीब 500 लोग घायल हुए। मृतकों में 20 पुलिसकर्मी तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लगभग 50 सुरक्षागार्ड शामिल हैं। निःसंदेह यह हमला सीधे तौर पर बेनजीर भुट्टो को ही निशाना बनाकर किया गया था। परन्तु वे बाल-बाल बच गईं। हालांकि जिस विशेष बुलेटप्रूफ वाहन में वह सवार थीं, उसके शीशे जरूर टूट गए।
बेनजीर भुट्टो के काफिले पर हुए इस हमले के विषय में कई तरह की बातें की जा रही हैं। हमले के तुरन्त बाद सर्वप्रथम बेगम भुट्टो के पति आसिफ जरदारी ने तो पाकिस्तान सरकार व प्रशासन को ही इस हमले का जिम्मेदारी ठहरा दिया था। परन्तु बेनजीर भुट्टो ने अपने पति के बयान को नजर अंदाज करते हुए इन हमलों के पीछे पूर्व राष्ट्रपति जिआ-उल-हक के समर्थक, पूर्व सेना अधिकारियों का हाथ बताया। उधर तालिबान की ओर से भी बेगम भुट्टो की पाकिस्तान वापसी को एक बडी अमेरिकी साजिश का परिणाम बताया जा रहा है। उनका मानना है कि अमेरिका चाहता है कि भुट्टो, मुशर्रफ को सहयोग दे ताकि वजीरिस्तान तथा अन्य कबाईली क्षेत्रों में तालिबानों के विरुद्घ और कडे कदम उठाए जा सकें। परन्तु एक तालिबानी कमांडर ने कहा कि चाहे जनरल परवेज मुशर्रफ हों या उसके पश्चात बेगम बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनें, तालीबानी हमले इसी प्रकार जारी रहेंगे।
कराची के फैसल हाईवे पर बहादुराबाद पुलिस स्टेशन के अन्तर्गत भुट्टो के काफिले पर हुआ हमला उनके कराची पहुंचने के 10 घंटों के बाद किया गया। जिस समय यह हमला हुआ उस समय नेशनल हाईवे पर बिजली गायब थी। बावजूद इसके कि बेनजीर भुट्टो ने पाकिस्तान सरकार व प्रशासन को इस हमले के संबंध में क्लीन चिट दे दी है तथा बेगम भुट्टो ने यह भी स्वीकार किया है कि पुलिस प्रबंध एवं सुरक्षा के सभी प्रबंध शत-प्रतिशत दुरुस्त एवं संतोषजनक थे। परन्तु उसके बावजूद हादसे के समय राजमार्ग पर बिजली गुल होने की घटना को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। यह किसी बडी साजिश का नतीजा भी माना जा रहा है। यही वजह है कि बेनजीर भुट्टो ने अपने काफिले पर हुए इस हमले की जांच अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों से कराए जाने की मांग भी कर डाली है। इसके जवाब में पाकिस्तान के गृहमंत्री आफताब खां शेरपाव ने भी स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान सरकार इस हादसे की जांच बहुत निष्पक्षता से कर रही है। पाकिस्तान के एक और कद्दावर नेता चौधरी शुजात हुसैन ने तो यहां तक कह दिया था कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने बेगम भुट्टो की लोकप्रियता तथा जनता की सहानुभूति हासिल करने के मद्देनजर पी पी पी द्वारा यह हमले स्वयं कराए हैं। बेगम भुट्टो ने हुसैन के बयान को पागलपन भरा बयान कहकर टाल दिया।
इस हमले के पश्चात कई तरह के प्रश्न उत्पन्न हो रहे हैं। क्या बेनजीर भुट्टो इस हमले से घबराकर पाकिस्तान छोड देंगी? जनरल मुशर्रफ तथा बेनजीर भुट्टो के बीच हुए समझौते के तहत बेगम भुट्टो को कब और कौन सा स्थान मिलेगा? क्या मुशर्रफ और भुट्टो दोनों मिलकर आतंकवाद व चरमपंथ जैसे भस्मासुर का पूरी जोरदारी से मुकाबला कर सकेंगे? और इन सबसे बडा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह ने एक ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान की कल्पना की थी जहां कि चरमपंथियों द्वारा आए दिन धर्म के नाम पर खून की होलियां खेली जाती हों? यदि हम पाकिस्तान के मात्र तीन दशकों के इतिहास का अति संक्षिप्त जायजा लें तो हम देखेंगे कि 1977 में पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल जिया-उल-हक ने तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया था। तथा उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था व स्वयं को पाकिस्तान का शासक घोषित कर दिया था। जनरल जिया ने भुट्टो की गिरफ्तारी के बाद मात्र दो वर्षों बाद ही 1979 में उन्हें फांसी पर लटका दिया था। लगभग 10 वर्षों तक पाकिस्तान में हुकूमत करने के बाद 1988 में जनरल जिया एक विमान हादसे में मारे गए। जिया की मौत के पश्चात पाकिस्तान में आम चुनाव हुए तथा पकिस्तान पीपुल्स पार्टी सत्ता में आई व बेगम बेनजीर भुट्टो पहली बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं। दरअसल 1977 से लेकर 1988 तक का जनरल जिया-उल-हक का दौर ही पाकिस्तान में किसी भी शासक का वह दौर-ए-हुकूमत था जिसमें कि वहाँ चरमपंथी विचारधारा को खूब फलने-फूलने का मौका मिला, आतंकवाद बढा, आतंकवादी ठिकाने बढे, कट्टरपंथी शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले मदरसों की संख्या में वृद्घि हुई। यहां तक कि जिन्नाह के सपनों का धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान एक रूढीवादी और कट्टरपंथी पाकिस्तान की राह पर चल पडा।
आज यदि अशांत देशों की बात की जाए तो सबसे पहले इराक या अफगानिस्तान जैसे देश का नाम जेहन में उभर कर सामने आता है। परन्तु प्रतिष्ठित न्यूज पत्रिका न्यूजवीक ने अपने एक ताजातरीन अंक में तो पाकिस्तान को ही विश्व का सबसे खतरनाक देश बताया है। इराक व अफगानिस्तान से भी ज्यादा खतरनाक देश। इसका कारण बताते हुए न्यूजवीक ने लिखा है कि दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठन अलकायदा पाकिस्तान में ही फल-फूल रहा है। इसके अतिरिक्त यहां आतंकवादियों को सुरक्षित तौर पर शरण मिल जाती है। सीमा पार से बेरोक-टोक आवाजाही होने के कारण भी घुसपैठियों व आतंकवादियों के लिए शरणस्थली के रूप में पाकिस्तान से सुरक्षित देश दुनिया में दूसरा कोई नहीं है। पाकिस्तानी अस्पतालों में तो आतंकवादी बेरोक-टोक व बेखौफ होकर अपना इलाज भी करवाते हैं। लाल मस्जिद जैसी घटनाएं भी न्यूजवीक के दावे को सही ठहराने के लिए काफी हैं। फिर प्रश्न यह है कि आखिर पाकिस्तान का भविष्य है क्या?
दरअसल बेकाबू होते जा रहे इन हालात से निपट पाना अब न तो अकेले मुशर्रफ के बस की बात है न ही बेनजीर भुट्टो,  नवाज शरीफ अथवा अन्य किसी राजनैतिक दल की। चरमपंथी विचारधारा के विरुद्घ पाकिस्तान की सभी राजनैतिक शक्तियां जब तक एकजट नहीं होती तथा पूरी पारदर्शिता व ईमानदारी से इन बिगडते हुए हालात पर काबू नहीं पाती तो आने वाला समय पाकिस्तानी अवाम व पाकिस्तानी शासन के लिए अत्यधिक खतरनाक हो सकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि तालिबानी विचारधारा पाकिस्तान का भी वही हाल करना चाह रही हो जोकि उसके अपने देश अफगानिस्तान का हुआ है। अतः वक्त का तकाजा है कि पाकिस्तानी अवाम जनरल जिया के सपनों के पाकिस्तान के निर्माण के बजाए जिन्नाह के सपनों के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर आधारित एक ऐसे पाकिस्तान के निर्माण की ओर बढे जो पूरे विश्व के लिए वास्तव में ‘पाक’ देश के रूप में जाना जाए न कि विश्व के सबसे बडे आतंकवादी देश के रूप में अपनी पहचान बनाए।


 तनवीर जाफरी, (सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी) 
2240/2, नाहन हाऊस अम्बाला शहर। हरियाणा, फोन - 0171-2535628   मोः 098962-19228
[email protected]