आसो ईसर अखां, अखां इम कवियो अलू

चारण भगत कवियां रै चरणां में-गिरधरदान रतनू दासोड़ी


 आसो ईसर अखां,
अखां इम कवियो अलू।
दाखां केसोदास,
भणां सँग मांडण भलू।
कवियण करमाणद,
गोदड़ हुवो गुणगामी।
हुवो ऐम हरदास,
जीभ जपण जगजामी।
चूंडो रु जेम  माधव चवां,
सिमरण कीधो साम नै।
कर जोड़ गीध दँडवत करै
नरहर नामी नामनै।।

 कहियै सिरहर कोल्ह,
सकव तेजसी सिरोमण।
झूलो सांइयो जबर,
गायो गिरधर रो गुण।
रतनू हुवो हमीर,
रात-दीह रांम रीझायो।
वीठू ब्रह्मा दास,
परमपद इणविध पायो।
आसियो ब्रह्म जाणै अवन,
खरो रतन गुण -खाण रो!
चतरपाण गीध शरणो चहै,
वाचै अखर बखाण रो।।

 पीरदान प्रख्यात,
जिको धर जुढियै जाणो।
हरी सूं कीनो हेत,
बोल जस सकव बखाणो।
बारठ कान्हो वल़ै,
टेर हर काया तपतो
मनसुध मथुरादास,
जिको गुण राघव जपतो।
वीरभाण इक रतनू वडो,
दखां ईसर दधवाड़ियो।
राम रो नाम गिरधर रसा,ईहगां इणां उचारियो।।

 नितां नम्यो नाराण,
पात सदा हरी पायक।
जाण जीवाणँद जेम,
गुणां गोमँद रो गायक।
दूदो फेरूं देख,
मन तजदी मोहमाया।
सकवी सिवो सुफेर,
करी निरमल़ इम काया।
चौमुख अनै चोल़ो चवां,
राम नाम नित रेरियो।
 मानजै गीध पाछो मुरड़,
घोटो जम रो घेरियो।।

 संतदास सिरमोड़,
पंथ गूदड़ियां पेखो।
आढो ओपो अवर,
लियो रघु -नाम सुलेखो।
चव कवियो चिमनेस,
वल़ै वाणी वरदायक।
रतनू परसाराम,
लियो जस -रस यूं लायक।
जसकरण नाम हर हर जप्यो,
मही रतनू धिन माढ रै।।श
गीधिया वरण अंजस गहर,
चाव भाव चित चाढ रै।।

भीखो रतनू भेर,
सांवल़  आसो सुणीजै।
सांदू रायांसिंघ ,
भगत सिरताज भणीजै।
सांगड़ियै सिवदान,
कठण तप जोग कमायो।
कह गाडण कलियांण,
सरस मन नाथ सरायो।
सांम रा दास मानै सकल़,साखा जग भरवै सही,
सुभियांण गीध सरणो सदा,कव ज्यांरो उत्तम कही।।

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